| जगदलपुर, बस्तर, छत्तीसगढ़
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दंडकारण्य के विभिन्न रंग

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भारत के मानचित्र पर छत्तीसगढ़ का दक्षिणी हिस्सा, जिसे हम बस्तर संभाग के नाम से जानते हैं, केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं है। यह एक रहस्य है, एक दर्शन है, और एक जीती-जागती आदिम सभ्यता है। प्राचीन काल से इसे ‘दंडकारण्य’ के नाम से जाना जाता रहा है—एक ऐसा विशाल वन क्षेत्र जो अपनी घनघोर हरियाली और रहस्यमयी खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है। आज भी, जब आप साल (Sal) और सागौन (Teak) के इन घने जंगलों में प्रवेश करते हैं, तो हवाओं में एक अलग तरह की आदिम सुगंध महसूस होती है।

बस्तर की पहचान यहाँ के जलप्रपात या गुफाएँ तो हैं ही, लेकिन इसकी असली आत्मा यहाँ के आदिवासी—गोंड, मारिया, मुड़िया, भतरा, हलबा, धुरवा और दोरला—हैं। इन जनजातियों के लिए कला, जीवन से अलग कोई वस्तु नहीं है। यहाँ कला संग्रहालयों में नहीं, बल्कि मिट्टी के घरों की दीवारों पर, आंगन में गूंजती मांदर की थाप पर, और गले में पहने हुए आभूषणों में बसती है।

इस विस्तृत लेख में, हम दंडकारण्य के उन हजारों रंगों को उकेरने का प्रयास करेंगे जो इसकी लोक-संस्कृति, नृत्य, संगीत और शिल्प को विश्व में अद्वितीय बनाते हैं।

विस्तार से जानने के लिए इसे हम पहले निम्न भागों में विभाजित करेंगे :-

भाग 1 : सामजिक ताना-बाना और घोटुल ।

भाग 2: लोकगीत – दंडकारण्य की मौखिक साहित्य परंपरा।

भाग 3: लोकनृत्य – जहाँ पांव थिरकते नहीं, बात करते हैं।

भाग 4: बस्तर का दशहरा – दुनिया का सबसे अनोखा पर्व।

भाग 5: हस्तशिल्प – धातु, मिट्टी और लकड़ी में ढली कविताएं।

भाग 6: बस्तर का दर्शन और आधुनिक चुनौतियाँ।

 

भाग 1 : सामजिक ताना-बाना और घोटुल ।

बस्तर के आदिवासी समाज की बुनियाद सामुदायिक जीवन पर टिकी हुई है। यहाँ व्यक्ति अकेला नहीं होता। उसका अस्तित्व परिवार, टोला, गांव और पूरे समाज से जुड़ा रहता है। इसी कारण यहाँ “मैं” से पहले “हम” आता है। कोई भी काम, चाहे वह खेती हो, जंगल से आजीविका जुटाना हो, घर बनाना हो या पर्व-त्योहार मनाना, सब कुछ सामूहिक रूप से किया जाता है। इसी सामुदायिक सोच का सीधा असर कला पर दिखाई देता है। बस्तर का कोई भी लोकनृत्य अकेले नहीं किया जाता। नृत्य हमेशा समूह में होता है, गोल घेरा बनाकर, जहाँ हर व्यक्ति बराबर है। न कोई नायक, न कोई दर्शक। जो नाच रहा है, वही समाज का प्रतिनिधि है। यह कला प्रदर्शन नहीं, बल्कि भागीदारी है।

लोकगीतों में भी व्यक्तिगत भावनाओं से ज्यादा सामूहिक अनुभव बोलता है। गीत किसी एक इंसान की कहानी नहीं कहते, बल्कि पूरे समाज की स्मृति को संजोते हैं। जंगल, बारिश, फसल, पूर्वज, देवी-देवता, संघर्ष और खुशी, सब कुछ “हम” के नजरिए से आता है। इसलिए इन गीतों में अहंकार नहीं, अपनापन होता है।

शिल्प और चित्रकला में भी यही भाव दिखता है। दीवारों पर बने चित्र किसी कलाकार के नाम से नहीं जाने जाते। वे पूरे गांव की पहचान होते हैं। कौन चित्र बना रहा है, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं, जितना यह कि चित्र क्यों बनाया जा रहा है। कला का उद्देश्य सौंदर्य प्रदर्शन नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक जरूरतों को पूरा करना होता है।

यह सामुदायिक संरचना ही बस्तर की कला को जीवित रखती है। यहाँ कला बाजार की मांग से नहीं, समाज की जरूरत से पैदा होती है। यही कारण है कि बस्तर की कला में बनावट से ज्यादा भावना, तकनीक से ज्यादा अर्थ और व्यक्तिगत प्रसिद्धि से ज्यादा सामाजिक संतुलन दिखाई देता है। संक्षेप में कहें तो बस्तर की कला को समझना मतलब बस्तर के “हम” को समझना। जब तक हम इस सामूहिक सोच को नहीं समझेंगे, तब तक हम उसकी कला को केवल देखेंगे, महसूस नहीं कर पाएंगे।

घोटुल: आदिवासी संस्कृति का विश्वविद्यालय

बस्तर की मुड़िया जनजाति की संस्कृति में ‘घोटुल’ का स्थान केंद्रीय है। बाहरी दुनिया ने अक्सर इसे गलत समझा है, लेकिन वास्तव में, घोटुल एक प्राचीन सामाजिक संस्था और ‘युवा गृह’ है। यह एक ऐसा केंद्र है जहाँ आदिवासी युवा (चेलीक) और युवतियां (मोटियारी) अपने सामाजिक दायित्व, परंपराएं, गीत, नृत्य और अनुशासन सीखते हैं।

घोटुल ही वह स्थान है जहाँ बस्तर की लोककला जीवित रहती है। यहाँ का अनुशासन बहुत कठोर होता है और यहाँ नेतृत्व क्षमता का विकास किया जाता है। घोटुल की दीवारों पर की गई नक्काशी और वहाँ सिखाए जाने वाले नृत्य ही आगे चलकर बस्तर की सांस्कृतिक पहचान बनते हैं। यहाँ सिखाया जाता है कि जीवन को उत्सव की तरह कैसे मनाया जाए।

 

भाग 2: लोकगीत – दंडकारण्य की मौखिक साहित्य परंपरा।

बस्तर में लिपियों का इतिहास बहुत पुराना नहीं माना जाता, लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि यहाँ ज्ञान या साहित्य का अभाव रहा है। सच तो यह है कि बस्तर का मौखिक साहित्य इतना विशाल और गहरा है कि वह किसी लिखित परंपरा से कम नहीं, बल्कि कई अर्थों में उससे अधिक समृद्ध दिखाई देता है। यहाँ शब्द काग़ज़ पर नहीं, बल्कि स्मृति, गीत और जीवन में सुरक्षित रहे हैं। बस्तर के आदिवासी समाज में जीवन का कोई भी चरण ऐसा नहीं है, जहाँ गीत न हो। जन्म के समय अलग गीत, नामकरण के लिए अलग, युवावस्था, विवाह, कामकाज, पर्व-त्योहार, खेती की शुरुआत और फसल कटाई, यहाँ तक कि मृत्यु और शोक के लिए भी विशेष गीत हैं। ये गीत केवल मनोरंजन नहीं करते, बल्कि समाज को दिशा देते हैं। इनमें जंगलों की समझ, मौसम की पहचान, श्रम का सम्मान और जीवन को देखने का दर्शन छिपा होता है। सुरों के भीतर अनुभव बोलते हैं और शब्दों के बीच पीढ़ियों की सीख बहती है। इसी मौखिक परंपरा से बस्तर के लोकनृत्य जन्म लेते हैं। ये नृत्य मंच के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए हैं। हर नृत्य किसी न किसी सामाजिक, धार्मिक या मौसमी अवसर से जुड़ा होता है।

प्रमुख लोकगीत – 

  1. धार्मिक लोकगीत – देवी-देवताओं, प्रकृति और पूर्वजों के प्रति आस्था व्यक्त करते हैं।

  2. संस्कार लोकगीत – जीवन के विभिन्न संस्कारों को सहजता से समाज में स्थापित करते हैं।

  3. ज्ञानवर्धक लोकगीत – अनुभव, नीति और व्यवहार की शिक्षा देते हैं, बिना उपदेश दिए।

  4. अन्य लोकगीतों में श्रम, प्रेम, प्रकृति और सामाजिक जीवन की सहज अभिव्यक्ति मिलती है।

कुल मिलाकर, बस्तर की कला और साहित्य लिखित शब्दों पर नहीं, बल्कि जीए गए जीवन पर आधारित है। यही वजह है कि यहाँ का मौखिक साहित्य आज भी जीवित है, बहता हुआ है और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखता है।

 

भाग 3: लोकनृत्य – जहाँ पांव थिरकते नहीं, बात करते हैं।

बस्तर के लोकनृत्य केवल समय बिताने या मनोरंजन के साधन नहीं हैं। वे प्रकृति, पूर्वजों और समुदाय के बीच चलने वाले एक सतत संवाद का रूप हैं। जब नर्तक धरती पर कदम रखते हैं, तो वह केवल लय नहीं बनाते, बल्कि जंगल, पहाड़ और पुरखों की स्मृति को भी साथ लेकर चलते हैं। हर थाप, हर घुमाव और हर ताल में किसी न किसी अनुभूति का अर्थ छिपा होता है। इन नृत्यों में वेशभूषा और वाद्य यंत्र केवल सजावट नहीं, बल्कि प्रतीक होते हैं। पंख, सींग, बीज, मनके और धातु के आभूषण जंगल और पशु जीवन से जुड़ी आस्था को दर्शाते हैं। मांदर, ढोल, मोहरी जैसे वाद्यों की ध्वनि वातावरण को ऐसा रूप देती है कि पूरा गांव एक लय में सांस लेने लगता है। नृत्य के समय यह भव्य संयोजन इतना प्रभावशाली होता है कि देखने वाला केवल दर्शक नहीं रहता। वह स्वयं उस अनुभव का हिस्सा बन जाता है। यही बस्तर के लोकनृत्यों की विशेषता है, जहाँ कला देखने की चीज़ नहीं, बल्कि महसूस करने का अनुभव बन जाती है।

प्रमुख लोकनृत्य –

  1. करसाड़ या ककसार नृत्य – सामूहिक उल्लास और सामाजिक एकता का प्रतीक है।

  2. गौर नृत्य – जिसे बैसन हॉर्न नृत्य भी कहा जाता है, वीरता और वन्य जीवन से जुड़ी भावना को प्रकट करता है।

  3. हल्की या हुल्की नृत्य – इसमें लय की सरलता और सामूहिक सहभागिता दिखाई देती है।

  4. मांदरी नृत्य – ढोल की थाप पर आधारित होता है और श्रम व उत्सव दोनों से जुड़ा रहता है।

  5. गेड़ी नृत्य – जिसे डिटोंग भी कहा जाता है, संतुलन और कौशल का अद्भुत उदाहरण है।

  6. डंडारी और दण्डामी नृत्य – सामाजिक उत्सवों और परबों में किए जाते हैं।

  7. एबालतोर नृत्य – इसमें परंपरा और अनुष्ठान की झलक मिलती है।

  8. दोरला या पेंडुल नृत्य – इसमें गति और समूह तालमेल प्रमुख होता है।

  9. हुलकी पाटा, परब नाच और घोटुल पाटा नृत्य – युवाओं की सामुदायिक संस्कृति से गहराई से जुड़े हैं।

  10. कोलांग पाटा, पूसकोलांग और देव कोलांग नृत्य – धार्मिक आस्था और देव परंपराओं को अभिव्यक्त करते हैं।

 

भाग 4: बस्तर का दशहरा – दुनिया का सबसे अनोखा पर्व।

बस्तर की संस्कृति का जिक्र हो और वहां के दशहरे की बात न हो, तो यह लेख अधूरा रहेगा। बस्तर का दशहरा, उत्तर भारत के प्रचलित दशहरे से पूरी तरह अलग है। यहाँ रावण दहन की परंपरा नहीं है, बल्कि यह शक्ति की उपासना का पर्व है।

  • 75 दिनों का उत्सव: यह दुनिया का सबसे लंबा चलने वाला त्यौहार है, जो लगभग 75 दिनों तक चलता है।

  • दंतेश्वरी माई की आराधना: यह पर्व बस्तर की आराध्य देवी ‘दंतेश्वरी माई’ को समर्पित है।

  • रथ यात्रा: इस पर्व का मुख्य आकर्षण विशाल लकड़ी का दुमंजिला रथ है, जिसे आदिवासी अपने हाथों से खींचते हैं। इस रथ को बनाने के लिए जंगल से विशेष लकड़ी लाने की परंपरा से लेकर रथ खींचने तक, हर काम में अलग-अलग जनजातियों की भूमिका तय होती है। यह सामाजिक समरसता (Social Harmony) का बेजोड़ उदाहरण है।

  • मुरिया दरबार: दशहरे के अंतिम चरण में राजा और प्रजा का एक सम्मेलन होता है जिसे ‘मुरिया दरबार’ कहते हैं। यहाँ आदिवासियों की समस्याओं को सुना जाता है और उनका समाधान किया जाता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक प्राचीन रूप है।

 

भाग 5: हस्तशिल्प – धातु, मिट्टी और लकड़ी में ढली कविताएं।

दंडकारण्य के आदिवासी अपने हाथों से जादू बिखेरते हैं। यहाँ का हस्तशिल्प अब स्थानीय बाजारों से निकलकर पेरिस और लंदन तक अपनी पहचान बना चुका है।

1. ढोकरा कला (Bell Metal Craft) – घड़वा शिल्प

यह बस्तर की सबसे प्रसिद्ध कला है। यह लगभग 4000 साल पुरानी ‘लस्ट वैक्स तकनीक’ (Lost Wax Technique) है, जो सिंधु घाटी सभ्यता की तकनीकों की याद दिलाती है।

  • प्रक्रिया: इसमें पहले मिट्टी का ढांचा बनाया जाता है, फिर उस पर मोम के धागों से बारीक नक्काशी की जाती है। इसके बाद उस पर फिर मिट्टी का लेप लगाकर आग में पकाया जाता है। मोम पिघलकर निकल जाता है और उसकी जगह पिघली हुई पीतल या कांसा धातु ले लेती है।

  • विषय: इसमें आदिवासियों के दैनिक जीवन, शिकार के दृश्य, नर्तक, हाथी, घोड़े और स्थानीय देवों की मूर्तियाँ बनाई जाती हैं। हर मूर्ति अद्वितीय होती है क्योंकि मोम का सांचा एक बार ही इस्तेमाल होता है।

2. लौह शिल्प (Wrought Iron Craft) –

बस्तर में उच्च गुणवत्ता का लोह अयस्क मिलता है। यहाँ के लुहारों ने इसे कला में बदल दिया। वे भट्ठियों में लोहे को तपाकर और पीटकर सजावटी वस्तुएं बनाते हैं। इसमें दीये, आदिवासी आकृतियाँ, और जानवरों के आकार प्रमुख हैं। काले लोहे की ये कलाकृतियाँ अपनी सादगी और आधुनिकता के लिए जानी जाती हैं।

3. काष्ठ शिल्प (Wood Carving) –

दंडकारण्य के वनों में साल और सागौन की लकड़ी प्रचुर मात्रा में है। यहाँ के कलाकार लकड़ी पर बारीक़ नक्काशी करके सजावटी दरवाजे, खंभे, और मूर्तियाँ बनाते हैं। विशेषकर ‘घोटुल’ के खंभों पर की गई नक्काशी और लकड़ी के मुखौटे (Masks) बस्तर की काष्ठ कला का बेहतरीन नमूना हैं।

4. टेराकोटा और बांस शिल्प –

बस्तर के कुम्हार मिट्टी से हाथी और घोड़े बनाते हैं जिन्हें स्थानीय देवगुड़ियों (देवता का स्थान) में चढ़ाया जाता है। नारायणपुर का टेराकोटा अपने विशाल आकार और बारीक काम के लिए प्रसिद्ध है। वहीं, बांस से बनी टोकरियाँ, चटाइयां और मछली पकड़ने के जाल (Traps) भी कलात्मकता का परिचय देते हैं।

 

भाग 6: बस्तर का दर्शन और आधुनिक चुनौतियाँ।

 बस्तर की कला केवल सुंदरता के लिए नहीं है, यह एक जीवन शैली है जो ‘सह-अस्तित्व’ (Co-existence) पर आधारित है। यहाँ के गीत हमें सिखाते हैं कि नदी, पहाड़ और पेड़ हमारे सहचर हैं।

हालांकि, आधुनिकीकरण और औद्योगीकरण की आँधी में यह संस्कृति चुनौतियों का सामना कर रही है।

  • नई पीढ़ी का पलायन और आधुनिक मनोरंजन के साधनों के कारण पारंपरिक गीतों और नृत्यों का चलन कुछ कम हुआ है।

  • फिर भी, बस्तर का आदिवासी समाज अपनी जड़ों को बहुत मजबूती से पकड़े हुए है। आज कई सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास इस विरासत को सहेजने और इसे वैश्विक मंच (Global Platform) प्रदान करने में जुटे हैं।

 

दंडकारण्य या बस्तर, केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है। यह एक अनुभव है। यहाँ के ‘गौर मार’ नृत्य की ऊर्जा, ‘रेलो’ गीतों की मिठास, और ‘ढोकरा’ कला की बारीकियों में एक ऐसी दुनिया बसती है जो निश्छल है जब आप बस्तर आते हैं, तो आप केवल एक जगह नहीं घूमते, बल्कि आप उस आदिम लय को महसूस करते हैं जिससे हम सब जुड़े हुए हैं। बस्तर के ये विभिन्न रंग—लाल मिट्टी, हरे जंगल, पीतल की चमक और काले लोहे की मजबूती—मिलकर एक ऐसा चित्र बनाते हैं जो अमिट है।

यह लेख केवल एक झांकी है। बस्तर की असली धड़कन को सुनने के लिए आपको उन जंगलों में जाना होगा, मांदर की थाप को महसूस करना होगा और उन सरल आदिवासियों की मुस्कान को देखना होगा जो आज भी दुनिया की भागदौड़ से दूर, अपनी धुन में मगन हैं।

आइये, अपनी इस अनमोल सांस्कृतिक विरासत को जानें, सराहें और संरक्षित करें।

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बस्तरिया बाबू

बस्तरिया बाबू

बस्तर की जनजातीय संस्कृति, इतिहास और सामाजिक जीवन पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक। उनके लेख बस्तर के आदिवासी समाज की परंपराओं, पेन-परब संस्कृति, लोकजीवन और समकालीन मुद्दों को समझने का प्रयास करते हैं।

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