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आदिवासी उपयोजना की राशि प्रचार खर्च पर क्यों?
जोहार!
मैं बस्तर की माटी का एक अदना सा हिस्सा हूँ। उसी माटी का, जहाँ की हवाओं में सदियों से दफन संघर्षों की गूँज है, जहाँ के पेड़ों की पत्तियाँ आज भी अपने अधिकारों के लिए सरसराती हैं, और जहाँ के आदिवासियों की आँखों में जल, जंगल, जमीन की सुरक्षा के साथ-साथ एक गरिमापूर्ण जीवन का सपना तैरता रहता है। आज जब मैं अपने हाथ में एक सरकारी दस्तावेज और आंकड़ों का पुलिंदा देखता हूँ, तो भीतर एक गहरी टीस उठती है। यह टीस सिर्फ मेरी नहीं है, बल्कि उस समूचे आदिवासी समाज की है जिसे विकास की मुख्यधारा में लाने के नाम पर दशकों से केवल कागजी सुनहरे सपने दिखाए गए हैं।
हाल ही में छत्तीसगढ़ विधानसभा में एक प्रश्न (क्रमांक 48, श्रीमती सावित्री मनोज मंडावी द्वारा पृच्छित प्रश्न) के लिखित उत्तर में जो आंकड़े सामने आए हैं, वे किसी भी संवेदनशील इंसान को झकझोरने के लिए काफी हैं। 1 जनवरी 2024 से 31 मार्च 2026 के बीच, यानी लगभग सवा दो साल की अवधि में, जनसंपर्क विभाग द्वारा कुल ₹1,095.20 करोड़ (लगभग ₹1,095 करोड़) की भारी-भरकम राशि केवल और केवल ‘प्रचार-प्रसार’ पर खर्च कर दी गई। चौंकाने वाली बात यह नहीं है कि सरकार अपनी ब्रांडिंग पर कितना खर्च कर रही है; चौंकाने वाली और दिल को दुखाने वाली बात यह है कि इस ₹1,095 करोड़ में से ₹22,17,79,242 (22.17 करोड़ रुपये से अधिक) की राशि उस ‘आदिवासी उपयोजना’ (Tribal Sub-Plan – TSP) से निकाली गई, जिसका एकमात्र वैधानिक और नैतिक उद्देश्य आदिवासी समाज का सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक और समग्र विकास करना था।
आदिवासी उपयोजना (TSP) का मूल दर्शन और हमारी वास्तविकता :
आदिवासी उपयोजना कोई सरकारी खैरात या कोई सामान्य योजना नहीं है। यह भारतीय संविधान की भावनाओं और पाँचवीं-छठी अनुसूची के दर्शन के तहत तैयार की गई एक विशेष बजटीय व्यवस्था है। इसका सीधा नियम है कि आदिवासी क्षेत्रों की जनसंख्या के अनुपात में बजट का एक हिस्सा सीधे उनके उत्थान के लिए आरक्षित रहेगा। इस पैसे का उद्देश्य बस्तर, सरगुजा या देश के किसी भी आदिवासी अंचल के दूरदराज के गांवों में स्कूल खोलना, सड़कों का निर्माण करना, शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना, कुपोषण से लड़ना और आदिवासी युवाओं को रोजगार के साधन मुहैया कराना है।
लेकिन जब इस पवित्र धनराशि को होर्डिंग्स, टीवी विज्ञापनों, अखबारों के पूरे पन्नों की चमक-दमक, और डिजिटल मीडिया के विज्ञापनों में झोंक दिया जाता है, तो ऐसा लगता है कि हमारे अस्तित्व और हमारे हक पर एक क्रूर मजाक किया गया है। आदिवासी समाज का विकास महलों के विज्ञापनों से नहीं, बल्कि जंगलों और गांवों में चलने वाली प्राथमिक शालाओं से होता है। जब सरकार कहती है कि ‘पैसा नहीं है’ इसलिए स्कूल बंद किए जा रहे हैं, जब सरकार कहती है कि वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण नई नौकरियां नहीं निकाली जा सकतीं, तो फिर उसी समय प्रचार-प्रसार के लिए अरबों रुपये कहाँ से आ जाते हैं? यह एक ऐसा यक्ष प्रश्न है, जो आज छत्तीसगढ़ के हर उस आदिवासी के जेहन में कौंध रहा है जो शिक्षा और रोजगार के लिए भटक रहा है।
सरकारी जनसंपर्क व्यय का लेखा-जोखा :
विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों पर यदि हम बारीकी से नजर डालें, तो पता चलता है कि सरकार की प्राथमिकताएं धरातल के विकास से कितनी दूर और चमक-दमक के कितने करीब हैं। नीचे दी गई तालिका उस सच को बयां करती है जिसे हम विज्ञापनों की चकाचौंध में देख नहीं पाते:
| क्र. | व्यय की मद (Category) | व्यय राशि (रुपये में) |
| 1 | इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (Electronic Media) | ₹3,44,04,57,623 |
| 2 | प्रिंट मीडिया (Print Media) | ₹1,98,26,30,840 |
| 3 | सोशल डिजिटल मीडिया (Social Digital Media) | ₹55,81,91,658 |
| 4 | सोशल मीडिया (Social Media) | ₹5,78,45,391 |
| 5 | प्रकाशन मीडिया (Publication Media) | ₹19,17,85,671 |
| 6 | क्षेत्र प्रचार (Field Publicity) | ₹4,14,01,04,531 |
| 7 | आदिवासी उपयोजना (TSP – Tribal Sub-Plan) | ₹22,17,79,242 |
| 8 | विशेष अवसर पर प्रचार (Special Occasions) | ₹35,92,41,742 |
| कुल व्यय (Total Expenditure) | ₹10,95,20,36,698 |
(जरा सोचिए, ₹414 करोड़ से अधिक की राशि ‘क्षेत्र प्रचार’ पर और ₹344 करोड़ से अधिक की राशि ‘इलेक्ट्रॉनिक मीडिया’ पर खर्च हो जाती है। वहीं, हमारे बच्चों के भविष्य को संवारने वाली ‘आदिवासी उपयोजना’ से ₹22.17 करोड़ रुपये निकालकर प्रचार की वेदी पर चढ़ा दिए जाते हैं। क्या यह आदिवासियों के साथ न्याय है?)
‘ पैसा नहीं है’ बनाम ‘अरबों का खर्च ‘ :
एक आदिवासी होने के नाते, मैं रोज बच्चों को स्कूलों में देखता हूँ। हमारे यहाँ बस्तर के अंदरूनी इलाकों में आज भी ऐसे स्कूल हैं जहाँ छत टपकती है, जहाँ ब्लैकबोर्ड टूटे हुए हैं, और जहाँ एक ही शिक्षक पूरी प्राथमिक शाला को संभालने के लिए मजबूर है। जब हम प्रशासन से मांग करते हैं कि हमारे स्कूलों को बेहतर बनाओ, शिक्षकों की भर्ती करो, तो ऊपर से एक ही रटा-रटाया जवाब आता है – “बजट की कमी है, राज्य में अभी पैसा नहीं है।”
इस ‘पैसा नहीं है’ के जुमले के पीछे जो खेल चल रहा है, उसे तीन प्रमुख बिंदुओं में समझा जा सकता है:
क) स्कूलों का बंद होना और शिक्षा का संकुचन: पैसे की कमी का बहाना बनाकर लगातार अंदरूनी क्षेत्रों के प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों को बंद किया जा रहा है या उन्हें दूसरे स्कूलों में ‘मर्ज’ (विलय) किया जा रहा है। इसका परिणाम यह होता है कि एक आदिवासी बच्चे को, जिसे पहले अपने गाँव में ही प्राथमिक शिक्षा मिल जाती थी, अब पाँच-दस किलोमीटर दूर पैदल चलकर जाना पड़ता है। रास्ते की असुरक्षा और दूरी के कारण कई बच्चियाँ पढ़ाई छोड़ देती हैं। क्या हमारे बच्चों की शिक्षा से ज्यादा जरूरी सरकारी योजनाओं का होर्डिंग्स पर मुस्कुराता हुआ चेहरा है?
ख) सरकारी संस्थानों का असमर्थता के नाम पर निजीकरण: सरकारी नीति निर्माताओं का एक नया तर्क यह है कि सरकार के पास अस्पताल, कॉलेज या तकनीकी संस्थान चलाने के लिए संसाधन नहीं हैं, इसलिए इनका निजीकरण किया जा रहा है। कॉरपोरेट घरानों को जमीनें और संसाधन सौंपे जा रहे हैं। जब एक आदिवासी के हाथ से उसके क्षेत्र का अस्पताल या कॉलेज निकलकर निजी हाथों में चला जाता है, तो वह शिक्षा और स्वास्थ्य उसकी पहुंच से बाहर हो जाते हैं। यदि सरकार के पास इन्हें चलाने के लिए पैसे नहीं हैं, तो जनसंपर्क के लिए ₹1,095 करोड़ रुपये कहाँ से आ रहे हैं?
ग) नई नौकरियों का अकाल और युवाओं का हताशा: बस्तर और पूरे छत्तीसगढ़ का पढ़ा-लिखा आदिवासी युवा आज नौकरियों की राह देख रहा है। बस्तर फाइटर्स जैसी कुछ भर्तियों को छोड़ दें, तो व्यापक प्रशासनिक और शैक्षणिक पदों पर भर्तियां ठप पड़ी हैं या बहुत धीमी हैं। परीक्षा की तारीखें आगे बढ़ती रहती हैं, और युवा “नो वैकेंसी” का बोर्ड देखकर वापस अपने खेतों की ओर या फिर हताशा के अंधेरे में लौट जाता है। सरकारी खजाने पर पहला हक युवाओं के रोजगार का होना चाहिए या विज्ञापनों के अनुबंधों का?
धरातल का सच :
विज्ञापनों में जो बस्तर या जो छत्तीसगढ़ दिखाया जाता है, वह बहुत हरा-भरा, समृद्ध और खुशहाल दिखता है। चमचमाती सड़कें, मुस्कुराते हुए चेहरे और आधुनिक सुविधाओं का ताना-बाना। लेकिन आइए, मैं आपको बिना किसी विज्ञापन के, धरातल के उस सच से रूबरू कराता हूँ जिसे हर आदिवासी रोज जीता है:
कमजोर स्वास्थ्य सुविधाएं: आज भी बस्तर के कई गांवों में यदि कोई महिला प्रसव पीड़ा में होती है, तो उसे चारपाई पर लादकर मुख्य सड़क तक लाना पड़ता है क्योंकि अंदरूनी गांवों तक एम्बुलेंस नहीं पहुंच सकती। जिला अस्पतालों में डॉक्टरों और जीवन रक्षक दवाओं की कमी एक आम बात है। जो ₹22 करोड़ रुपये आदिवासी उपयोजना से प्रचार पर खर्च हुए, उससे कम से कम दर्जनों सुसज्जित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोले जा सकते थे या सैकड़ों एम्बुलेंस खरीदी जा सकती थीं।
बुनियादी सुविधाओं का अभाव: आज भी हमारे कई पारे-टोले (मोहल्ले) ऐसे हैं जहाँ पीने के साफ पानी के लिए महिलाओं को कोसों दूर जाना पड़ता है। दूषित पानी पीने की वजह से हर साल बरसात के मौसम में आदिवासी गांवों में डायरिया और जलजनित बीमारियों का प्रकोप फैलता है। सड़कों की हालत यह है कि पहली बारिश में ही कई गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय से पूरी तरह कट जाता है।
विधिक और प्रशासनिक आधार पर सवाल :
लोकतंत्र में नीति निर्माताओं से सवाल पूछना कोई गुनाह नहीं है, बल्कि यह एक नागरिक का परम कर्तव्य है। एक सजग समाज के रूप में हमें यह पूछना होगा कि आदिवासी उपयोजना (TSP) के दिशा-निर्देशों का यह खुला उल्लंघन किस प्रशासनिक स्वीकृति के तहत किया गया? टीएसपी का पैसा केवल उन्हीं कार्यों में खर्च किया जा सकता है जिससे सीधे तौर पर अनुसूचित जनजाति (ST) आबादी को आर्थिक या सामाजिक लाभ पहुंचे। प्रचार-प्रसार से किसी आदिवासी परिवार की थाली में रोटी नहीं आती, न ही उसके बच्चे को अक्षर ज्ञान मिलता है।
क्या नौकरशाही और राजनीतिक नेतृत्व ने टीएसपी के मार्गदर्शी सिद्धांतों को दरकिनार कर दिया है? यदि हाँ, तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। विधानसभा में यह प्रश्न उठना इस बात का प्रमाण है कि अब आवाजें सिर्फ जंगलों से नहीं उठ रही हैं, बल्कि वे लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर तक गूँज रही हैं।
हमारा भविष्य, हमारा अधिकार :
हम आदिवासी इस देश के मूल निवासी हैं। हम याचक नहीं हैं, हम अपने अधिकारों के हकदार हैं। सदियों से हमने इस जंगल को बचाया है, इस माटी की रक्षा की है। जब प्रकृति संकट में थी, तब आदिवासियों की जीवनशैली ने ही इस धरती को जीवन दिया। आज विकास के नाम पर हमारी जमीनों के नीचे छिपे खनिजों को तो निकाला जा रहा है, लेकिन उस खनिज का लाभ हमारे बच्चों तक नहीं पहुंच रहा है।
हमें विज्ञापनों की आभासी दुनिया नहीं चाहिए। हमें चमचमाते कागजों पर छपी अपनी तारीफें नहीं चाहिए। हमें चाहिए हमारे गांवों में बेहतर स्कूल, क्रियाशील अस्पताल, युवाओं के लिए सम्मानजनक रोजगार, और हमारे जल-जंगल-जमीन पर हमारा अपना संप्रभु अधिकार।
यह लेख केवल आंकड़ों का विश्लेषण नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी और एक आह्वान है। लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि होती है और जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसके टैक्स का और उसके कल्याण के लिए आरक्षित धन का एक-एक पैसा कहाँ खर्च हो रहा है। हम सरकार से सीधे शब्दों में यह मांग करते हैं कि भविष्य में आदिवासी उपयोजना की एक भी पाई प्रचार-प्रसार जैसे अनुत्पादक कार्यों पर खर्च न की जाए। सारा धन शत-प्रतिशत आदिवासी समाज की शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर ही केंद्रित होना चाहिए।
याद रखिए: “विकास हमारा अधिकार है, प्रचार नहीं; हमें हमारा सुरक्षित भविष्य चाहिए!”

