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lingo pen karsad 2026 - Bastariya Babu
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अप्रैल 2026 में होगा लिंगो पेन का विश्व प्रसिद्ध करसाड़

कोयतुर समुदाय के आराध्य गुरु लिंगो पेन का विश्व प्रसिद्ध करसाड़ 2, 3 और 4 अप्रैल 2026 को अंतागढ़ विकासखंड के ग्राम वल्लेकनार्र, आमाबेड़ा (कांकेर) में आयोजित होगा। इसमें छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों से गोंडीयन समाज और शोधार्थी शामिल होंगे।

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लिंगो पेन का विश्व प्रसिद्ध करसाड़

लिंगो पेन करसाड़ – कोयतुर (गोंडी) समुदाय के आराध्य गुरु लिंगो पेन का विश्व प्रसिद्ध करसाड़ इस वर्ष भी पूरे पारंपरिक वैभव, आस्था और सांस्कृतिक गरिमा के साथ आयोजित होने जा रहा है। गोंडी परंपरा में लिंगो पेन को समाज का मार्गदर्शक और सांस्कृतिक संरक्षक माना जाता है, इसलिए उनसे जुड़ा यह करसाड़ केवल एक आयोजन ही नहीं बल्कि कोयतुर समाज की सामूहिक आस्था, इतिहास और परंपराओं का महापर्व माना जाता है।

इस वर्ष यह महत्वपूर्ण आयोजन 2, 3 एवं 4 अप्रैल 2026 को छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के अंतागढ़ विकासखंड अंतर्गत ग्राम वल्लेकनार्र, आमाबेड़ा में आयोजित किया जाएगा। तीन दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में पारंपरिक पूजा-पद्धति, पेन अनुष्ठान, सामुदायिक बैठकें और सांस्कृतिक गतिविधियाँ संपन्न होंगी, जिनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु और समाजजन शामिल होते हैं।

करसाड़ की तैयारियाँ अभी से तेज़ी से प्रारंभ हो चुकी हैं। स्थानीय स्तर पर समाज के सियान, पेन पुजारियों और पारंपरिक पदाधिकारियों की बैठकें लगातार आयोजित की जा रही हैं ताकि आयोजन की सभी व्यवस्थाएँ समय पर पूरी की जा सकें। ग्राम वल्लेकनार्र और आसपास के क्षेत्रों में भी इस आयोजन को लेकर उत्साह का वातावरण देखा जा रहा है, क्योंकि करसाड़ केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि समाज की सामूहिक भागीदारी और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।

इस भव्य आयोजन को सफल बनाने के लिए स्थानीय समुदाय के साथ-साथ प्रशासन भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। जिला प्रशासन द्वारा आयोजन स्थल की व्यवस्थाओं, आवागमन, सुरक्षा, पेयजल, स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य आवश्यक सुविधाओं को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक तैयारियाँ की जा रही हैं, ताकि दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं और आगंतुकों को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

लिंगो पेनकड़ा सेवा समिति का गठन

करसाड़ के सुचारू संचालन और व्यवस्थाओं के लिए लिंगो पेनकड़ा सेवा समिति वल्लेकनार्र का गठन किया गया है। इस समिति में क्षेत्र के वरिष्ठ सियान, पारंपरिक पदाधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी दी गई है।

  • अध्यक्ष: वरिष्ठतम सियान कोरेट सुक्कू

  • संरक्षक: परगन माजी हिड़को चंदन, पेन माजी हल्लम सहदेव और वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता हिड़को रामसिंह

  • उपाध्यक्ष: पेन पुजार्क पट्टव राजकुमार, दुरवा दिनेश, कोरेट दशरथ, हुर्रा अमरीत, कोरेट मंगलु, गोटा दलसाय, आंचला बालसाय, मड़व उदेसिंह, पट्टव राजेंद्र, गोटा मनऊ और मांझी शशी

  • सचिव: हिड़को मंगलू एवं हुर्रा ओमप्रकाश

  • संयुक्त सचिव: हिड़को मनीष

  • सहसचिव: पटेल देवेंद

  • कोषाध्यक्ष: हल्लम श्यामसिंह एवं सेठिया रैनू

  • मीडिया प्रभारी: पट्टव सुगदू एवं हुर्रा महेश

12 बानी बिरादरी के प्रतिनिधि

लिंगो पेनकड़ा के 12 बानी बिरादरी के प्रतिनिधियों को भी समिति में स्थान दिया गया है, जिनमें आंचला सुकड़ू, बघेल विनायक, पटेल गरीबालाल, सेठिया रामलाल, यादव मनोहर, मड़व हलाल, कोरेट मनी, कोरेट बृज, आंचला गागरू, मड़व राजाराम, उसेंड लछमन, कोरेट मेहतर और सी.पी. शामिल हैं। इन प्रतिनिधियों की भूमिका करसाड़ आयोजन के दौरान विभिन्न पारंपरिक और सामाजिक व्यवस्थाओं के समन्वय में महत्वपूर्ण रहेगी।

आदिम समुदाय के आराध्य हैं लिंगो पेन

कोयतुर आदिम समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में लिंगो पेन का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और सर्वोच्च माना जाता है। कोयतुर समाज उन्हें केवल एक देवतुल्य शक्ति के रूप में ही नहीं, बल्कि अपने आध्यात्मिक गुरु, मार्गदर्शक और सांस्कृतिक संरक्षक के रूप में भी स्मरण करता है। गोंडी परंपराओं और मौखिक इतिहास में यह विश्वास प्रचलित है कि लिंगो पेन ने ही कोयतुर समाज को संगठित जीवन पद्धति, सामाजिक अनुशासन और धार्मिक आस्थाओं की दिशा प्रदान की।

गोंडी लोकमान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में जब कोयतुर समुदाय अलग-अलग समूहों में बिखरा हुआ था और उनके जीवन में स्पष्ट सामाजिक व्यवस्था का अभाव था, तब लिंगो पेन ने समाज को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया। उन्होंने समुदाय को सामूहिक जीवन, पारंपरिक नियमों और सांस्कृतिक मूल्यों का मार्ग दिखाया। यही कारण है कि गोंडी समाज में उन्हें एक ऐसे गुरु के रूप में स्मरण किया जाता है जिन्होंने केवल धर्म का ही नहीं बल्कि समाज के संपूर्ण जीवन-दर्शन का आधार स्थापित किया।

लिंगो पेन को कोयतुर समाज की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी माना जाता है। उनके माध्यम से समाज ने अपने त्योहारों, अनुष्ठानों, गीत-नृत्यों और सामुदायिक परंपराओं को पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित रखा है। गोंडी लोककथाओं और पारंपरिक कथनों में लिंगो पेन के कार्यों और उनके उपदेशों का उल्लेख मिलता है, जो समाज को आज भी अपने मूल्यों और परंपराओं से जुड़े रहने की प्रेरणा देते हैं।

विदित हो कि लिंगो पेन आदिम समुदाय का निर्विवाद आराध्य पेन हैं, यह करसाड़ हर तीन वर्ष बाद चैत्र पुन्नी (पूर्णिमा) तिथि के शुक्रवार को आयोजित होता है। इस आयोजन की प्रतीक्षा पूरे आदिम समुदाय को लंबे समय तक रहती है, क्योंकि यह अवसर समाज के विभिन्न क्षेत्रों में बसे लोगों को एक मंच पर एकत्र होने का अवसर देता है।

कर्रे कदवल कोर्रामी द्वारा हुई शुरुआत

इस वर्ष के करसाड़ की औपचारिक शुरुआत शुक्रवार के दिन कर्रे कदवल कोर्रामी द्वारा कर्रे काटकर की गई। गोंडी परंपरा में कर्रे काटना आयोजन के शुभारंभ का प्रतीक माना जाता है। यह परंपरा समाज के पेन पुरखों के प्रति सम्मान और आह्वान का प्रतीक भी है।

देश-विदेश से जुटते हैं श्रद्धालु और शोधार्थी

लिंगो पेन का यह करसाड़ केवल स्थानीय स्तर का आयोजन नहीं है, बल्कि इसकी पहचान विश्व प्रसिद्ध सांस्कृतिक आयोजन के रूप में बन चुकी है। इस अवसर पर बस्तर संभाग के विभिन्न पेन-परंपरा से जुड़े लोग, छत्तीसगढ़ के अलावा ओडिशा, आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश सहित कई राज्यों से गोंडीयन समुदाय के लोग बड़ी संख्या में भाग लेने आते हैं।

इसके साथ-साथ कई शोधार्थी, सांस्कृतिक अध्ययनकर्ता और आदिवासी परंपराओं पर कार्य करने वाले विद्वान भी इस आयोजन में शामिल होकर आदिम संस्कृति, गोंडी परंपराओं और पेन उपासना से जुड़े ज्ञान को समझने और अध्ययन करने का प्रयास करते हैं।

प्रशासन भी तैयारियों में सक्रिय

इतने बड़े आयोजन को देखते हुए कांकेर जिला प्रशासन भी इसकी तैयारियों में सक्रिय रूप से जुट गया है। जिला कलेक्टर नीलेश महादेव क्षीरसागर, जिला पंचायत सीईओ – हरेश मंडावी लगातार ग्राम वल्लेकनार्र का दौरा कर रहे हैं और व्यवस्थाओं का जायजा ले रहे हैं।

कलेक्टर ने सभी विभागों के जिला स्तरीय अधिकारियों, स्थानीय सरपंचों, जनपद सदस्यों और लिंगो पेनकड़ा सेवा समिति के पदाधिकारियों के साथ संयुक्त बैठक आयोजित कर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए हैं। प्रशासन की ओर से सुरक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, यातायात और अन्य बुनियादी व्यवस्थाओं को लेकर विस्तृत योजना तैयार की जा रही है ताकि लाखों श्रद्धालुओं के आगमन के दौरान किसी प्रकार की असुविधा न हो।

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