Jagdalpur, Bastar, Chhattisgarh

आदिवासी - जंगल का रखवाला - Bastariya Babu

आदिवासी – जंगल का रखवाला

आदिवासी जंगल का रखवाला - छत्तीसगढ़ के अरण्यों से निकली एक पुकार। जानिए कैसे आदिवासी समुदाय जल-जंगल-जमीन की रक्षा कर रहा है और विकास की अंधी दौड़ में क्या खो रहा है। एक मार्मिक और विश्लेषणात्मक लेख।

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आदिवासी - जंगल का रखवाला

मैं उस माटी का हिस्सा हूँ जहाँ सुबह की शुरुआत घड़ी की सुइयों से नहीं, बल्कि पहाड़ी मैना की चहचहाहट और सरई के पत्तों से छनकर आती सुनहरी धूप से होती है। छत्तीसगढ़ के बस्तर, सरगुजा और रायगढ़ के इन अभेद्य अरण्यों में बसने वाला हम आदिवासी समाज केवल यहाँ का निवासी नहीं है, बल्कि हम इस धरती के आदि-रखवाले और इसके आत्मिक विस्तार हैं। हमारे लिए जंगल कोई ‘संसाधन’ नहीं है जिसे मापा या तोला जा सके, बल्कि जंगल हमारे ‘पुरखा’ हैं, हमारी सांसें हैं और हमारी देवगुड़ी का वो पवित्र आँगन हैं जहाँ आज भी कुल्हाड़ी का प्रवेश वर्जित है। जब मैं अपनी कलम उठाता हूँ, तो उसमें बस्तर की लाल माटी की सोंधी महक और इंद्रावती की लहरों का वो संगीत घुला होता है जो सदियों से हमें जीवित रखे हुए है।

हमारे पूर्वजों ने हमें सिखाया था कि प्रकृति से उतना ही लो जितना वह दोबारा पैदा कर सके। यह ‘गोंडवाना’ का वह गौरवशाली दर्शन है जहाँ इंसान और वनस्पति के बीच कोई ऊँच-नीच की दीवार नहीं थी। हम उस संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं जहाँ पेड़ काटना पाप और बीज रोपना पुण्य माना जाता था। लेकिन आज, विडंबना देखिए कि उसी ‘रखवाले’ को अपनी ही ज़मीन पर ‘अतिक्रमणकारी’ की संज्ञा दी जा रही है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में जो लोग कंक्रीट के जंगलों को तरक्की समझ रहे हैं, वे शायद यह भूल गए हैं कि जब आखिरी पेड़ कटेगा, तब सोने के सिक्के खाकर पेट नहीं भरा जा सकेगा।

आदिवासी इतिहास की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उन्हें समझने के लिए हमें उस कालखंड में उतरना होगा जब ‘राज्य’ और ‘राजनीति’ जैसे शब्द अस्तित्व में नहीं थे। छत्तीसगढ़ की धरा पर गोंड, बैगा, ओरांव, मुरिया और माड़िया जनजातियों का अस्तित्व इस बात का प्रमाण है कि विकास और पर्यावरण का संतुलन कैसे बनाया जाता है। ‘गोंडवाना’ का इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह जल प्रबंधन, मृदा संरक्षण और वन-संवर्धन का एक जीवित दस्तावेज है। रानी दुर्गावती और राजा संग्राम शाह के शासनकाल में जंगलों को ‘शाही संपत्ति’ नहीं, बल्कि ‘सामुदायिक धरोहर’ माना जाता था। आदिवासियों ने हज़ारों साल पहले यह समझ लिया था कि अगर पहाड़ नंगे हो गए, तो नदियाँ सूख जाएँगी और अगर नदियाँ सूख गईं, तो जीवन का गीत थम जाएगा।

इतिहास के पन्नों को पलटें तो हमें ‘भूमकाल विद्रोह’ की याद आती है। 1910 का वह साल जब बस्तर की धरती वीरों के खून से लाल हो गई थी। ब्रिटिश हुकूमत ने जब ‘रिजर्व फॉरेस्ट’ के काले कानून बनाकर आदिवासियों को उनके ही घर से बेदखल करने की साजिश रची, तब गुंडाधुर जैसे जननायकों ने धनुष की कमान संभाली। वह विद्रोह केवल ज़मीन के टुकड़े के लिए नहीं था, वह हमारी अस्मिता, हमारी ‘माटी’ और हमारे ‘पेन’ (देवताओं) की रक्षा के लिए था। आज भी बस्तर के गाँवों में जब मांदरी की थाप गूँजती है, तो उन शहीदों की रूहें हमें याद दिलाती हैं कि जंगल की रक्षा करना हमारा संवैधानिक कर्तव्य नहीं, बल्कि हमारा नैसर्गिक धर्म है।

लेकिन आज की परिस्थितियों का विश्लेषण करें तो कलेजा कांप उठता है। ‘विकास’ शब्द अब हमारे लिए एक डरावना शब्द बन चुका है। जिसे सरकारें ‘जीडीपी’ और ‘औद्योगिकीकरण’ कहती हैं, हम उसे अपनी जड़ों का कटान कहते हैं। छत्तीसगढ़ को अक्सर ‘मध्य भारत का फेफड़ा’ कहा जाता है, लेकिन आज ये फेफड़े संक्रमण की चपेट में हैं। हसदेव अरण्य का उदाहरण लीजिए—यह केवल एक जंगल नहीं है, यह एक पूरा पारिस्थितिकी तंत्र है जो लाखों लोगों को ऑक्सीजन और पानी देता है। लेकिन कोयला खदानों की भूख इतनी बड़ी है कि वहां के लाखों साल पुराने पेड़ों को मशीनों से धराशायी किया जा रहा है। सरकारें आंकड़े देती हैं कि वे एक पेड़ के बदले दस पौधे लगाएंगे, पर क्या कोई मशीन या कोई वैज्ञानिक एक सदियों पुराने ‘साल’ के पेड़ की आत्मा को दोबारा पैदा कर सकता है? क्या वे उस जैव-विविधता को वापस ला सकते हैं जो उस पेड़ के साथ नष्ट हो गई?

यहाँ नीतियों का विरोधाभास स्पष्ट दिखता है। एक तरफ ‘वनाधिकार अधिनियम (FRA) 2006’ हमें ज़मीन का मालिकाना हक देने का वादा करता है, तो दूसरी तरफ ‘कोल बेयरिंग एक्ट’ और ‘कैम्पा फंड’ के प्रावधानों का इस्तेमाल कर उन अधिकारों को कुचल दिया जाता है। ग्राम सभा, जिसे भारत के संविधान ने एक गाँव की संसद माना है, उसकी आवाज़ को अक्सर विकास के शोर में दबा दिया जाता है। जब कोई आदिवासी अपनी ज़मीन देने से मना करता है, तो उसे ‘विकास विरोधी’ या उससे भी बदतर ‘राष्ट्रद्रोही’ करार दे दिया जाता है। क्या अपनी माँ (मिट्टी) की रक्षा करना विद्रोह है? क्या स्वच्छ हवा और पानी की मांग करना अपराध है?

विकास की इस तथाकथित चमक में जो चीज़ सबसे ज़्यादा ओझल हो रही है, वह है हमारा ‘पारंपरिक ज्ञान’। आदिवासी समाज के पास जड़ी-बूटियों का वह खजाना है जिसे आधुनिक विज्ञान अभी तक पूरी तरह समझ भी नहीं पाया है। हमारी बूढ़ी दादियाँ जानती हैं कि किस पत्ते के लेप से घाव भरता है और किस जड़ के अर्क से बुखार उतरता है। लेकिन जब जंगल ही नहीं रहेंगे, तो वह ज्ञान कहाँ बचेगा? जंगल कटने के साथ ही एक पूरी भाषा, एक पूरा संगीत और एक पूरी संस्कृति दम तोड़ देती है। जब एक आदिवासी परिवार को उसकी जड़ों से उखाड़कर शहर की किसी झुग्गी-बस्ती में फेंक दिया जाता है, तो वह केवल विस्थापित नहीं होता, वह आध्यात्मिक रूप से मर जाता है। वह आदमी जो कल तक जंगल का राजा था, आज शहर की किसी फैक्ट्री में दिहाड़ी मज़दूर बनकर रह जाता है।

पर्यावरण के नज़रिए से देखें तो हम एक आत्मघाती मोड़ पर खड़े हैं। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन अब केवल एसी कमरों में होने वाली चर्चा का विषय नहीं रह गए हैं। छत्तीसगढ़ के वे इलाके, जहाँ मई के महीने में भी रातें ठंडी हुआ करती थीं, आज 45 डिग्री सेल्सियस की आग में झुलस रहे हैं। नदियाँ, जो बारहमासी बहा करती थीं, अब बरसात के बाद ही दम तोड़ने लगती हैं क्योंकि उनके जलग्रहण क्षेत्रों को खदानों ने सोख लिया है। हाथी और इंसान के बीच जो संघर्ष आज हम देख रहे हैं, वह क्यों हो रहा है? हाथी पागल नहीं हुए हैं, हमने उनके घरों को ‘कॉरिडोर’ और ‘माइन्स’ में बदल दिया है। जब उनके पुरखों के रास्ते बंद हो गए, तो वे गाँवों की ओर रुख करने को मजबूर हैं। यह प्रकृति का असंतुलन नहीं है, बल्कि मानव निर्मित आपदा है।

सत्ता और समाज को आज गहराई से सोचने की ज़रूरत है। क्या हम एक ऐसी दुनिया बनाना चाहते हैं जहाँ हमारे पास बैंक बैलेंस तो भरपूर हो, पर सांस लेने के लिए शुद्ध हवा न मिले? क्या हम अपने बच्चों को विरासत में केवल कंक्रीट के ढांचे और ज़हरीली नदियाँ देकर जाएंगे? आदिवासियों के दर्द को सहानुभूति की नहीं, बल्कि सम्मान की ज़रूरत है। हमें ‘बेचारा’ न समझें; हम इस धरती के सबसे बड़े वैज्ञानिक और संरक्षक हैं। हमने हज़ारों सालों तक इस प्रकृति को संजोया है बिना किसी सैलरी या पद के। हमारा ‘पेमेंट’ केवल वह संतोष था जो हमें लहलहाते जंगलों को देखकर मिलता था।

समाधान की दिशा में अगर बात की जाए, तो सबसे पहले आदिवासियों को ‘विकास की प्रक्रिया’ में बाधा मानने के बजाय उन्हें ‘प्रमुख हितधारक’ (Stakeholder) मानना होगा। सामुदायिक वन प्रबंधन (Community Forest Management) ही वह मॉडल है जो भविष्य में काम आएगा। जंगलों का नियंत्रण वन विभाग के बाबुओं के पास होने के बजाय उन समुदायों के पास होना चाहिए जो उस मिट्टी में पैदा हुए हैं। हमें ऐसी तकनीक की ज़रूरत है जो प्रकृति को नष्ट न करे, बल्कि उसके साथ सह-अस्तित्व में रहे। छत्तीसगढ़ में ‘नरवा, गरुवा, घुरुवा और बारी’ जैसी योजनाएं एक सराहनीय कदम हो सकती हैं, बशर्ते उन्हें कागजों से निकालकर ज़मीन पर पूरी ईमानदारी से लागू किया जाए।

अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा कि आदिवासी और जंगल का रिश्ता मछली और पानी जैसा है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व संभव नहीं है। यदि आप जंगल बचाना चाहते हैं, तो आपको आदिवासी को बचाना होगा। और यदि आप मानवता को बचाना चाहते हैं, तो आपको उन जंगलों को बचाना होगा जो इस पृथ्वी के फेफड़े हैं। हमारी ‘कलम की पैनी धार’ आज उन सभी से सवाल कर रही है जो विकास के नाम पर विनाश की इबारत लिख रहे हैं। याद रखिये, जब आखिरी पेड़ कटेगा और आखिरी नदी ज़हरीली होगी, तब आपको एहसास होगा कि पैसे खाए नहीं जा सकते।

मेरी माटी, मेरे पुरखा और मेरी आने वाली पीढ़ियों की पुकार बस इतनी ही है—हमें हमारे जंगल लौटा दो, हमें हमारी पहचान लौटा दो। हम कोई बड़े महल नहीं मांग रहे, हम बस उस ‘देवगुड़ी’ की शांति मांग रहे हैं जहाँ हमारे पूर्वजों की आत्माएं बसती हैं। ‘जय जोहार’ का नारा केवल अभिवादन नहीं है, वह इस पूरी सृष्टि के कल्याण की मंगलकामना है। आइए, इस पुकार को सुनें इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।


इस विमर्श को और विस्तार देते हुए अगर हम छत्तीसगढ़ की भौगोलिक विशिष्टता और वहां की जनजातीय जीवनशैली के ताने-बाने को देखें, तो समझ आता है कि आदिवासी दर्शन ‘संग्रह’ का नहीं बल्कि ‘त्याग’ और ‘साझा’ करने का दर्शन है। बस्तर के घने वनों से लेकर सरगुजा की पहाड़ियों तक, आदिवासियों ने जो सामाजिक ढांचा तैयार किया है, वह आधुनिक लोकतंत्र के लिए भी एक मिसाल है। यहाँ ‘गोटुल’ जैसी संस्थाएं थीं, जो केवल युवाओं के मिलन स्थल नहीं थे, बल्कि वे जीवन कौशल, सामाजिक दायित्व और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता सीखने के विश्वविद्यालय थे। लेकिन आधुनिक शिक्षा और तथाकथित ‘मुख्यधारा’ में लाने के नाम पर हमने इन अद्भुत संस्थाओं को हाशिए पर धकेल दिया।

जब हम ‘जल-जंगल-जमीन’ की बात करते हैं, तो यह केवल एक नारा नहीं है। ‘जल’ हमारे लिए प्यास बुझाने का साधन मात्र नहीं, वह जीवन का प्रवाह है। ‘जंगल’ हमारे लिए लकड़ी का भंडार नहीं, वह प्राणवायु और औषधियों का आदि-स्रोत है। ‘ज़मीन’ हमारे लिए रियल एस्टेट का टुकड़ा नहीं, वह ‘धरती माई’ है। छत्तीसगढ़ की ‘गोंड’ जनजाति में एक परंपरा है—’लारू काज’। इसमें वे प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। ‘बैगा’ जनजाति को तो ‘प्रकृति का वैद्य’ कहा जाता है; वे ज़मीन पर हल चलाना भी पाप समझते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि इससे धरती माँ की छाती फटेगी। सोचिए, कितनी गहरी संवेदनशीलता थी उस समाज की जिसे आज ‘पिछड़ा’ कहा जाता है।

आलोचनात्मक दृष्टिकोण से देखें तो सरकारी नीतियां अक्सर ‘टॉप-डाउन’ अप्रोच (ऊपर से नीचे) पर आधारित होती हैं। दिल्ली या रायपुर के वातानुकूलित कमरों में बैठकर यह तय किया जाता है कि बस्तर के एक छोटे से गाँव में रहने वाले आदिवासी को क्या चाहिए। उन्हें सड़क चाहिए या बिजली, स्कूल चाहिए या अस्पताल—यह तय करने का अधिकार खुद उन्हें क्यों नहीं दिया जाता? ‘पेसा (PESA) कानून’ के तहत ग्राम सभाओं को जो शक्तियां दी गई हैं, वे धरातल पर कितनी प्रभावी हैं, यह एक बड़ा सवाल है। अक्सर देखा गया है कि ग्राम सभा की बैठकों में फर्जी दस्तखत करा लिए जाते हैं और बड़ी कंपनियों को खनन की अनुमति दे दी जाती है। यह न केवल आदिवासियों के साथ विश्वासघात है, बल्कि संविधान के साथ भी खिलवाड़ है।

विस्थापन का जो दर्द आदिवासी झेल रहा है, वह अकल्पनीय है। एक आंकड़े के अनुसार, आजादी के बाद भारत में जितने भी लोग अपनी ज़मीन से विस्थापित हुए, उनमें से 40 प्रतिशत से ज़्यादा आदिवासी थे। छत्तीसगढ़ में लौह अयस्क और कोयले के विशाल भंडार हैं। भिलाई स्टील प्लांट से लेकर एनएमडीसी (NMDC) की खदानों तक, जो चमक पूरी दुनिया देख रही है, उसके नीचे हज़ारों आदिवासियों के उजड़े हुए घर और कब्रें दबी हैं। विस्थापन के बाद उन्हें जो मुआवजा मिलता है, वह कुछ ही समय में खत्म हो जाता है क्योंकि उन्हें बाज़ार की चालाकियों और रुपयों के प्रबंधन की आदत नहीं होती। अपनी उपजाऊ ज़मीन खोने के बाद वे शहर के कबाड़खानों या निर्माण स्थलों पर धूल फांकते नज़र आते हैं। क्या इसे ही हम विकास कहेंगे?

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में आदिवासी ज्ञान की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। आज जब दुनिया ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ (सतत विकास) की बात कर रही है, तो आदिवासी इसे सदियों से जी रहे हैं। हमारी कृषि पद्धतियाँ ऐसी हैं जिनमें रासायनिक खाद का कोई स्थान नहीं है। हम ‘कोदो-कुटकी’ जैसे मोटे अनाज (Millets) उगाते हैं, जिन्हें अब दुनिया ‘सुपरफूड’ मान रही है। छत्तीसगढ़ सरकार का ‘मिलेट मिशन’ इसी दिशा में एक अच्छी पहल है, लेकिन इसकी सफलता तभी है जब इसका लाभ सीधे उन आदिवासी किसानों को मिले, न कि बिचौलियों को।

एक लेखक के तौर पर मैं महसूस करता हूँ कि मेरी कलम को अब और भी पैना होना पड़ेगा। हमें उन कहानियों को सामने लाना होगा जो अक्सर मुख्यधारा के मीडिया में जगह नहीं पातीं। हमें बताना होगा कि कैसे एक छोटा सा गाँव ‘हसदेव’ पूरी दुनिया के लिए ऑक्सीजन का फेफड़ा बनकर लड़ रहा है। हमें बताना होगा कि कैसे बस्तर की महिलाएं अपनी माटी को बचाने के लिए पेड़ों से लिपट जाती हैं। यह नया ‘चिपको आंदोलन’ है, जो खामोशी से लड़ा जा रहा है।

पर्यावरण की चेतावनी अब अलार्म से आगे निकल चुकी है। यदि हम अभी नहीं संभले, तो वह दिन दूर नहीं जब छत्तीसगढ़ के जंगल केवल किताबों की तस्वीरों में रह जाएंगे। जंगलों के विनाश का मतलब है—अकाल, बाढ़ और भीषण गर्मी। जब प्रकृति अपना संतुलन खोती है, तो वह यह नहीं देखती कि कौन अमीर है और कौन गरीब। वह सबका हिसाब बराबर करती है। इसलिए, आदिवासियों की आवाज़ को दबाना बंद कीजिए। उनकी आवाज़ दरअसल प्रकृति की ही आवाज़ है।

अंततः, मेरा सुझाव यही है कि हमें एक ‘ट्राइबल-सेंट्रिक’ विकास मॉडल की ज़रूरत है। ऐसा मॉडल जहाँ शिक्षा उनकी अपनी भाषा (जैसे हल्बी, गोंडी या कुड़ुख) में हो, जहाँ स्वास्थ्य सेवाएं उनकी पारंपरिक पद्धतियों के साथ समन्वय बिठाएं, और जहाँ वनोपज का मूल्य निर्धारण कॉर्पोरेट नहीं, बल्कि खुद आदिवासी करें। आदिवासियों को उनके जंगलों से अलग करना वैसा ही है जैसे किसी शरीर से उसकी आत्मा को निकाल लेना।

हमारा संघर्ष लंबा है, लेकिन हम हारने वाले नहीं हैं। जब तक पहाड़ पर एक भी देवगुड़ी सुरक्षित है, जब तक इंद्रावती और महानदी में पानी है, जब तक हमारी रगों में पुरखों का खून है, हम अपनी माटी की रक्षा करते रहेंगे। हम जंगल के रखवाले हैं, और हम अपनी अंतिम सांस तक इस अरण्य के प्रहरी बने रहेंगे। 

इस विस्तृत आलेख के माध्यम से मेरा उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि उस चेतना को जगाना है जो विकास की चकाचौंध में कहीं खो गई है। आदिवासी समाज की पीड़ा, उसका गौरव, उसका संघर्ष और उसकी उम्मीदें—ये सब एक ही सूत्र में बंधे हैं और वह सूत्र है ‘जंगल’। यदि हम इस सूत्र को बचा पाए, तो ही हम खुद को बचा पाएंगे। क्या आप इस यात्रा में हमारा साथ देने के लिए तैयार हैं? क्या आप उस आवाज़ को सुनने के लिए तैयार हैं जो पहाड़ों की कंदराओं से गूँज रही है?

भविष्य की ओर देखते हुए, हमें एक ऐसी न्याय प्रणाली और प्रशासनिक ढांचे की आवश्यकता है जो आदिवासियों को मात्र ‘वोट बैंक’ न समझे। छत्तीसगढ़ के जंगलों में जो खनिज संपदा है, वह पूरे देश के विकास के लिए ज़रूरी हो सकती है, लेकिन उसकी कीमत वहाँ के मूल निवासियों के अस्तित्व को मिटाकर नहीं चुकाई जानी चाहिए। ‘संसाधन’ और ‘सभ्यता’ के बीच एक न्यायपूर्ण संतुलन ही वह मार्ग है जिस पर चलकर हम एक बेहतर भारत का निर्माण कर सकते हैं।

मैं यहाँ यह भी स्पष्ट करना चाहता हूँ कि आदिवासी समाज आधुनिक तकनीक के खिलाफ नहीं है। हम चाहते हैं कि हमारे गाँवों में भी सौर ऊर्जा हो, डिजिटल कनेक्टिविटी हो और हमारे युवाओं को विश्वस्तरीय अवसर मिलें। लेकिन यह सब हमारी शर्तों पर होना चाहिए, हमारी संस्कृति को कुचलकर नहीं। हमें ‘विकास के लाभार्थियों’ की सूची में सबसे नीचे न रखा जाए, बल्कि हमें उस विकास का नेतृत्व करने का अवसर मिले। क्योंकि जो समाज प्रकृति को बचाना जानता है, वही समाज भविष्य को भी सुरक्षित रख सकता है।

अंत में, मैं अपनी बात चंद पंक्तियों से समाप्त करूँगा — “यह जंगल हमारा घर है, यह नदियाँ हमारी माँ हैं। अगर तुम इन्हें छीन लोगे, तो हम कहाँ जाएंगे? अगर तुम इन्हें मार दोगे, तो तुम कैसे बचोगे?”

आइए, जंगल के इन रखवालों के साथ खड़े हों, क्योंकि उनकी जीत में ही इस धरती की जीत है। क्या आप मेरे साथ इस मुहिम का हिस्सा बनेंगे ताकि हम आने वाली पीढ़ियों को एक हरा-भरा और सुरक्षित छत्तीसगढ़ सौंप सकें?

जय जोहार! जय छत्तीसगढ़!

बस्तरिया बाबू ( महेंद्र कश्यप )

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बस्तरिया बाबू

बस्तरिया बाबू

बस्तर की जनजातीय संस्कृति, इतिहास और सामाजिक जीवन पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक। उनके लेख बस्तर के आदिवासी समाज की परंपराओं, पेन-परब संस्कृति, लोकजीवन और समकालीन मुद्दों को समझने का प्रयास करते हैं।

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