तुम्बा शिल्प : बस्तर की प्रसिद्ध आदिवासी हस्तकला
भारत की आदिवासी कला परंपराएं केवल सजावटी अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे जीवन, प्रकृति और संस्कृति के गहरे संबंधों को भी दर्शाती हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में विकसित “तुम्बा शिल्प” इसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। साधारण लौकी को कलात्मक रूप देकर उपयोगी और सजावटी वस्तुओं में बदल देना इस शिल्प की मूल पहचान है। यह कला बस्तर की जनजातीय जीवनशैली, पर्यावरणीय समझ और रचनात्मक सोच का जीवंत प्रतीक है।
तुम्बा शिल्प की खासियत यह है कि यह पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित है। आधुनिक औद्योगिक उत्पादों के बीच यह हस्तकला न केवल अपनी मौलिकता बनाए हुए है बल्कि टिकाऊ जीवनशैली का संदेश भी देती है। आज यह शिल्प स्थानीय जरूरतों से आगे बढ़कर वैश्विक हस्तशिल्प बाजार में भी पहचान बना रहा है।
तुम्बा शिल्प का इतिहास
पहले के समय में बस्तर के आदिवासी समाज का जीवन पूरी तरह प्रकृति पर आधारित था। जंगलों और खेतों से मिलने वाली वस्तुएँ ही उनके दैनिक जीवन की जरूरतों को पूरा करती थीं। सूखी लौकी, जिसे स्थानीय बोली में “तुम्बा” कहा जाता है, उसी प्राकृतिक संसाधन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण थी। आदिवासी समुदाय इसका उपयोग पानी रखने, यात्रा के दौरान पेय पदार्थ ले जाने और घरेलू भंडारण के लिए करता था। सल्फी, महुआ की शराब या मंडिया जैसे पारंपरिक पेय पदार्थों को सुरक्षित रखने के लिए तुम्बा बेहद उपयोगी माना जाता था, क्योंकि सूखी लौकी हल्की होने के साथ-साथ टिकाऊ भी होती थी। यह केवल एक साधारण बर्तन नहीं था, बल्कि आदिवासी जीवन की जरूरतों और उनकी समझदारी का प्रतीक था।
समय के साथ जब लोगों ने अपने दैनिक उपयोग की वस्तुओं में सौंदर्य जोड़ना शुरू किया, तब तुम्बा पर सजावट की परंपरा विकसित हुई। महिलाएँ और शिल्पकार अपने बर्तनों पर सरल रेखाओं, ज्यामितीय आकृतियों और प्रकृति से प्रेरित पैटर्न बनाते थे। यह सजावट केवल दिखावे के लिए नहीं होती थी, बल्कि हर पैटर्न किसी न किसी सांस्कृतिक भावना या पहचान को भी दर्शाता था। धीरे-धीरे इन डिजाइनों ने एक कलात्मक रूप लेना शुरू किया और तुम्बा सिर्फ उपयोगी वस्तु से आगे बढ़कर सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया।
इसी पारंपरिक सोच से प्रेरित होकर केदाईचेपड़ा के प्रसिद्ध शिल्पकार जगत राम देवांगन ने तुम्बा के रूप और शैली के साथ नए प्रयोग शुरू किए। उन्होंने साधारण बर्तनों को केवल उपयोग तक सीमित न रखकर उसमें कला की संभावनाएँ तलाशीं। अलग-अलग आकार की लौकी चुनना, उसकी प्राकृतिक बनावट को समझना और गर्म चाकू से उस पर नक्काशी करना उनके प्रयोगों का मुख्य हिस्सा था। उन्होंने देखा कि लौकी की सतह पर उकेरी गई रेखाएँ न केवल सुंदर दिखती हैं बल्कि लंबे समय तक स्थायी भी रहती हैं। यही सोच आगे चलकर तुम्बा शिल्प की पहचान बन गई।
जगत राम देवांगन और अन्य शिल्पकारों ने दिलचस्प आकृतियों को चुनकर उन पर पारंपरिक और आधुनिक पैटर्न बनाए। कभी फूल-पत्तियों से प्रेरित डिजाइन, तो कभी जनजातीय प्रतीकों से जुड़े रूपांकन, हर नक्काशी में स्थानीय जीवन की झलक दिखाई देने लगी। धीरे-धीरे कलाकारों ने अलग-अलग उद्देश्यों के लिए लौकी को काटना और उसे नई आकृतियों में ढालना शुरू किया। यही प्रयोग “तुम्बा शिल्प” के रूप में विकसित हुआ, जिसने बस्तर की हस्तकला को एक नई दिशा दी।
स्थानीय ग्रामीणों के लिए जो कला पहले केवल बर्तन बनाने तक सीमित थी, वही अब रचनात्मकता का नया माध्यम बन गई। तुम्बा से दीये, गमले, लैंपशेड और यहां तक कि ज्वेलरी जैसे पेंडेंट भी बनने लगे। इस परिवर्तन ने न केवल शिल्प को नया बाजार दिया, बल्कि कलाकारों की कल्पनाशक्ति को भी विस्तार दिया। आज तुम्बा शिल्प केवल एक हस्तकला नहीं, बल्कि बस्तर की परंपरा, प्रकृति और आधुनिकता के संगम का प्रतीक बन चुका है। यह दिखाता है कि कैसे साधारण दैनिक वस्तुएँ भी कलाकार की दृष्टि और प्रयोगों से एक अनोखी सांस्कृतिक धरोहर का रूप ले सकती हैं।
सामाजिक जीवन में तुम्बा शिल्प की भूमिका
बस्तर का आदिवासी समाज प्रकृति और परंपराओं के साथ गहरे जुड़ाव के लिए जाना जाता है। यहां हस्तशिल्प केवल सजावटी वस्तुएं नहीं होते, बल्कि वे सामाजिक जीवन, मान्यताओं और सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा होते हैं। तुम्बा शिल्प भी इसी परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। शुरुआत में यह केवल एक उपयोगी बर्तन के रूप में प्रयोग किया जाता था, लेकिन समय के साथ इसका महत्व सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर बढ़ता गया। आज यह शिल्प बस्तर के लोगों की जीवनशैली, उत्सवों और सामुदायिक पहचान से जुड़ चुका है।
दैनिक जीवन से सामाजिक पहचान तक – पहले के समय में सूखी लौकी से बने तुम्बा का उपयोग पानी, स्थानीय पेय पदार्थ या अन्य आवश्यक चीजों को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता था। यह हल्का, मजबूत और आसानी से उपलब्ध होने के कारण हर घर में पाया जाता था। धीरे-धीरे जब लोगों ने अपनी दैनिक वस्तुओं को सजाना शुरू किया, तब तुम्बा पर भी नक्काशी और डिजाइन बनने लगे। यह सजावट केवल सौंदर्य के लिए नहीं थी, बल्कि यह परिवार या समुदाय की पहचान का भी प्रतीक बन गई।
गांवों में किसी व्यक्ति के पास मौजूद तुम्बा की बनावट और डिजाइन उसके सामाजिक अनुभव और कलात्मक रुचि को दर्शाती थी। कई बार विशेष अवसरों पर बनाए गए तुम्बा को उपहार के रूप में भी दिया जाता था, जिससे रिश्तों में आत्मीयता और सम्मान की भावना जुड़ती थी।
त्योहारों और अनुष्ठानों में महत्व – बस्तर के त्योहार और धार्मिक अनुष्ठान सामूहिकता और परंपरा से जुड़े होते हैं। इन अवसरों पर उपयोग होने वाली वस्तुओं में भी स्थानीय कला की झलक दिखाई देती है। तुम्बा शिल्प से बने दीये या सजावटी वस्तुएं कई बार उत्सवों के दौरान घरों और देवगुड़ियों की सजावट में इस्तेमाल होती हैं। इससे न केवल वातावरण सौंदर्यपूर्ण बनता है बल्कि सांस्कृतिक निरंतरता भी बनी रहती है।
कुछ समुदायों में पारंपरिक पेय पदार्थों को रखने के लिए सजाए गए तुम्बा का उपयोग विशेष अनुष्ठानों में किया जाता था। इस तरह यह शिल्प धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों का हिस्सा बन गया, जिससे इसकी सांस्कृतिक भूमिका और मजबूत हुई।
घर की सजावट और सौंदर्यबोध – समय के साथ जब लोगों में घर की सजावट को लेकर रुचि बढ़ी, तब तुम्बा शिल्प ने एक नया रूप लिया। दीवारों पर लटकाने वाले वॉल हैंगिंग, लैंपशेड और छोटे-छोटे सजावटी उत्पाद बनने लगे। इससे घरों में पारंपरिक सौंदर्य का स्पर्श जुड़ गया। खास बात यह है कि हर डिजाइन में प्रकृति की छाप दिखाई देती है, जैसे फूल-पत्तियां, पक्षियों की आकृतियां या ज्यामितीय पैटर्न।
यह सजावट केवल दिखावे के लिए नहीं होती, बल्कि यह लोगों के जीवन के अनुभवों और उनकी सांस्कृतिक स्मृतियों को भी दर्शाती है। जब घर में पारंपरिक शिल्प मौजूद होते हैं, तो वह स्थान केवल रहने की जगह नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान का केंद्र बन जाता है।
सांस्कृतिक अभिव्यक्ति और प्रतीकात्मकता – आदिवासी समाज में कला और जीवन के बीच गहरा संबंध होता है। तुम्बा शिल्प के डिजाइन में अक्सर ऐसे प्रतीक दिखाई देते हैं जो प्रकृति, पशु-पक्षियों या जनजातीय जीवन से जुड़े होते हैं। यह प्रतीक केवल सजावट नहीं बल्कि एक कहानी या भावना को भी व्यक्त करते हैं।
उदाहरण के लिए, कुछ डिजाइन समुदाय की एकता या प्रकृति के प्रति सम्मान को दर्शाते हैं। इस तरह हर नक्काशी अपने भीतर सांस्कृतिक अर्थ समेटे होती है। यही कारण है कि तुम्बा शिल्प को केवल हस्तकला नहीं बल्कि सांस्कृतिक भाषा भी कहा जा सकता है।
आर्थिक और सामुदायिक सहयोग – सामाजिक जीवन में तुम्बा शिल्प की भूमिका केवल सांस्कृतिक तक सीमित नहीं है। यह कई परिवारों के लिए आजीविका का साधन भी बन चुका है। गांवों में अक्सर पूरा परिवार इस शिल्प के अलग-अलग हिस्सों में भाग लेता है। कोई लौकी तैयार करता है, कोई डिजाइन बनाता है और कोई अंतिम सजावट करता है। इस सामूहिक प्रक्रिया से समुदाय में सहयोग और एकता की भावना मजबूत होती है।
महिलाओं की भागीदारी भी इस शिल्प में महत्वपूर्ण रही है। वे सजावटी पैटर्न बनाने और अंतिम रूप देने में अपनी रचनात्मकता दिखाती हैं, जिससे सामाजिक स्तर पर उनकी भूमिका और पहचान मजबूत होती है।
आधुनिक समय में बदलती भूमिका – आज के समय में तुम्बा शिल्प ने सामाजिक जीवन में एक नया स्थान बना लिया है। यह केवल ग्रामीण परंपरा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शहरों में भी होम डेकोर और सांस्कृतिक पहचान के रूप में लोकप्रिय हो रहा है। आधुनिक डिजाइन और बाजार की मांग के अनुसार कलाकार नए प्रयोग कर रहे हैं, जिससे यह शिल्प नई पीढ़ी के बीच भी आकर्षण का केंद्र बन रहा है।
इसके बावजूद, इसकी मूल भावना वही है जो शुरुआत में थी – प्रकृति से जुड़ाव और समुदाय की पहचान। यही कारण है कि आधुनिकता के बावजूद तुम्बा शिल्प अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।
सामाजिक जीवन में तुम्बा शिल्प की भूमिका बहुआयामी है। यह केवल एक हस्तकला नहीं, बल्कि बस्तर के आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक भावना का प्रतीक है। दैनिक उपयोग से लेकर त्योहारों, सजावट और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति तक, इस शिल्प ने हर स्तर पर अपनी जगह बनाई है। तुम्बा शिल्प हमें यह समझाता है कि कला और जीवन अलग नहीं होते, बल्कि दोनों मिलकर समाज की पहचान और इतिहास को आगे बढ़ाते हैं।
निर्माण प्रक्रिया का तकनीकी अध्ययन
तुम्बा शिल्प की निर्माण प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है, जिसमें पारंपरिक ज्ञान और कौशल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
लौकी का चयन – कलाकार सबसे पहले ऐसी लौकी चुनते हैं जिसकी आकृति अनोखी हो। आकार और मोटाई के आधार पर तय किया जाता है कि उससे किस तरह का उत्पाद बनाया जाएगा।
सुखाने की प्रक्रिया – लौकी को धूप में सुखाया जाता है। यह चरण बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इससे लौकी मजबूत और हल्की बनती है।
सफाई और खोखलापन – सूखने के बाद लौकी को साफ किया जाता है और अंदर से खोखला किया जाता है। यह काम सावधानी से किया जाता है ताकि बाहरी संरचना खराब न हो।
नक्काशी और डिजाइन – पेंसिल से डिजाइन बनाकर गर्म चाकू से उसे उकेरा जाता है। यह प्रक्रिया कला का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। गर्म चाकू से बनने वाली रेखाएं स्थायी होती हैं और प्राकृतिक रंग को उभारती हैं।
अंतिम फिनिशिंग – अंत में उत्पाद को साफ कर सजावटी रूप दिया जाता है। कुछ कलाकार प्राकृतिक रंगों या धागों का उपयोग करके इसे और आकर्षक बनाते हैं।
उत्पादों की विविधता
समय के साथ तुम्बा शिल्प ने केवल अपनी पारंपरिक पहचान को ही नहीं संभाला, बल्कि बदलते दौर की जरूरतों और बाजार की मांग के अनुसार खुद को लगातार विकसित भी किया है। पहले जहां सूखी लौकी का उपयोग केवल बर्तन या साधारण उपयोग की वस्तुओं तक सीमित था, वहीं आज कलाकारों की रचनात्मकता ने इसे एक व्यापक कलात्मक माध्यम बना दिया है। आधुनिक डिजाइन, नए प्रयोग और उपयोगिता के साथ सौंदर्य का संतुलन इस शिल्प की सबसे बड़ी विशेषता बन चुका है।
लैंपशेड और होम डेकोर उत्पाद –
तुम्बा शिल्प के सबसे लोकप्रिय उत्पादों में लैंपशेड प्रमुख हैं। कलाकार लौकी की प्राकृतिक गोल या लंबी आकृति का उपयोग करके ऐसे लैंपशेड बनाते हैं जिनसे निकलने वाली रोशनी नक्काशीदार डिजाइन के कारण बेहद आकर्षक दिखाई देती है। जब प्रकाश इन पैटर्न से होकर गुजरता है, तो दीवारों पर सुंदर छाया बनती है, जो घर के वातावरण को पारंपरिक और कलात्मक दोनों रूप देती है।
होम डेकोर के रूप में बने उत्पादों में छोटे सजावटी बर्तन, शोपीस और दीवार सजावट के आइटम भी शामिल हैं। इन पर अक्सर जनजातीय जीवन, प्रकृति और पशु-पक्षियों से प्रेरित आकृतियां उकेरी जाती हैं। आधुनिक घरों में प्राकृतिक और हस्तनिर्मित वस्तुओं की बढ़ती मांग ने इन उत्पादों की लोकप्रियता को और बढ़ा दिया है।
वॉल हैंगिंग और मास्क –
दीवारों पर सजाने के लिए बनाए जाने वाले वॉल हैंगिंग तुम्बा शिल्प का एक खास हिस्सा बन चुके हैं। कलाकार लौकी को अलग-अलग आकार में काटकर उस पर नक्काशी करते हैं और उसे रस्सियों या धागों के साथ सजाकर तैयार करते हैं। कई बार इन वॉल हैंगिंग में पारंपरिक प्रतीक, लोककथाओं से जुड़े रूपांकन या ज्यामितीय डिजाइन दिखाई देते हैं।
मास्क भी इस शिल्प की एक अनोखी श्रेणी है। ये मास्क केवल सजावटी वस्तु नहीं होते, बल्कि कई बार सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक भावनाओं को भी दर्शाते हैं। कुछ कलाकार जनजातीय चेहरे या प्रतीकात्मक आकृतियां बनाकर उन्हें आधुनिक शैली में प्रस्तुत करते हैं, जिससे यह कला पारंपरिक होने के साथ-साथ समकालीन भी दिखाई देती है।
प्लांटर और गमले –
पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता के साथ तुम्बा शिल्प में प्लांटर और गमलों का निर्माण भी शुरू हुआ है। हल्की और प्राकृतिक सामग्री होने के कारण ये प्लांटर छोटे पौधों के लिए बेहद उपयुक्त होते हैं। कलाकार इनमें ऐसे डिजाइन बनाते हैं जो पौधों के साथ मिलकर प्राकृतिक सौंदर्य को और बढ़ा देते हैं।
घर की बालकनी या अंदरूनी सजावट में इन गमलों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, क्योंकि लोग अब प्लास्टिक की बजाय प्राकृतिक और हस्तनिर्मित विकल्पों को पसंद कर रहे हैं। इससे न केवल कला को नया बाजार मिला है बल्कि पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली को भी बढ़ावा मिला है।
पेंडेंट और ज्वेलरी –
तुम्बा शिल्प का सबसे नया और रचनात्मक विस्तार ज्वेलरी के रूप में सामने आया है। पहले लौकी का उपयोग केवल बड़े उत्पादों तक सीमित था, लेकिन अब उसके छोटे-छोटे हिस्सों से पेंडेंट, ईयररिंग और अन्य आभूषण बनाए जा रहे हैं। यह नवाचार खासकर युवा पीढ़ी को आकर्षित कर रहा है, क्योंकि इसमें पारंपरिक कला के साथ आधुनिक फैशन का मेल दिखाई देता है।
इन ज्वेलरी आइटम्स में हल्कापन और प्राकृतिक बनावट सबसे बड़ी खासियत होती है। कलाकार छोटे आकार की लौकी के टुकड़ों पर बारीक नक्काशी करते हैं और उन्हें धागों या धातु के साथ जोड़कर नया रूप देते हैं। इससे यह शिल्प केवल सजावट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पहनने योग्य कला के रूप में भी पहचान बना रहा है।
पारंपरिक और आधुनिक शैली का संगम –
तुम्बा शिल्प की सबसे खास बात यह है कि इसमें परंपरा और आधुनिकता का संतुलन दिखाई देता है। पुराने समय के पैटर्न और प्रतीकों को आधुनिक डिजाइन के साथ जोड़कर कलाकार ऐसे उत्पाद बना रहे हैं जो आज के बाजार में भी आकर्षक लगते हैं। यही कारण है कि यह शिल्प स्थानीय मेलों से निकलकर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और शहरी बाजारों तक पहुंच चुका है।
आज कलाकार परिवहन और उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए डिजाइन तैयार करते हैं, ताकि उत्पाद हल्के, मजबूत और लंबे समय तक टिकाऊ रहें। छोटे लैंपशेड को बड़े लैंपशेड के अंदर रखना या ज्वेलरी उत्पादों को साथ में पैक करना जैसे प्रयोग इस शिल्प के व्यावहारिक और आधुनिक दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।
उत्पादों की विविधता और कलात्मक विस्तार ने तुम्बा शिल्प को नई पहचान दी है। यह कला अब केवल पारंपरिक उपयोग तक सीमित नहीं रही, बल्कि आधुनिक जीवनशैली का हिस्सा बन चुकी है। लैंपशेड, वॉल हैंगिंग, प्लांटर और ज्वेलरी जैसे नए उत्पाद इस बात का प्रमाण हैं कि जब परंपरा और रचनात्मकता साथ मिलती हैं, तो एक साधारण वस्तु भी वैश्विक स्तर पर आकर्षण का केंद्र बन सकती है।