Jagdalpur, Bastar, Chhattisgarh

सातधार – नैसर्गिक सुंदरता से परिपूर्ण

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(फोटो – ओम सोनी जी)

बस्तर का प्राकृतिक सौंदर्य ईश्वर की अनुपम सौगात है जो राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर के पर्यटन स्थलों की सूची में स्थान पा सकता है। बस्तर में शीत ऋतु में बैलाडीला के पर्वत शिखर पर छाया हुआ घना कोहरा काश्मीर की वादियों का एहसास कराता है, जो सम्पूर्ण बस्तर में फैली पर्वत श्रृंखलाएँ, पहाड़ों की रानी पचमढ़ी जैसी हरीतिमा की अनुभूति करा जाती है। कल-कल के नाद से प्रवाहित छोटी-बड़ी नदियाँ, एकाएक गहरे चट्टानों में गिरते हुए प्रवाह से बनने वाले जलप्रपात, भूगर्भीय सौंदर्य को समेटे तिमिर श्रृंगार युक्त गुफाएँ बस्तर के आभूषण हैं। जहाँ चम्बल की सी बीहड़ता वन पर्यटन में रोमांच का एहसास कराते हैं। वन्य प्राणियों का दर्शन इस पर्यटन के रोमांच को दुगना कर देता है। बस्तर में संस्कृति तथा पुरातत्व के दर्शन बारसूर, गढ़धनोरा, भोंगापाल, कांकेर, दंतेवाड़ा, में होते हैं।

इनमें बारसूर जो बाणासुर की राजधानी कही जाती थी, एक ऐसा पर्यटन केंद्र है जहाँ धार्मिक, संस्कृति व पुरातत्व की दृष्टि से बत्तीसा मंदिर, मामा-भांजा मंदिर, गणेश प्रतिमा, तथा यत्र-तत्र बिखरी हुई मूर्तियाँ, मंदिरों के भग्नावशेष, तालाबों के अवशेष, पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, वहीं औद्योगिक दृष्टि से अर्द्धनिर्मित इंदिरा जल विद्युत परियोजना महत्वपूर्ण है जो इंद्रावती नदी पर बनना प्रस्तावित था। इसी इंद्रावती पर बने पुल से दो कि.मी. दूर एक खूबसूरत जलप्रपात है- ‘सातधार’ ।

राष्ट्रीय राजमार्ग तिरसठ (63) पर जगदलपुर से 74 . कि.मी. दूर गीदम है, जहाँ से दाहिनी ओर 20 कि.मी. दूर अबूझमाड़ का दक्षिणी द्वार तथा बाणासुर की राजधानी कही जाने वाली नगरी बारसूर है। बारसूर से 6 कि.मी. आगे इंद्रावती नदी पर पुल निर्मित है, इसके एक कि.मी. पहले घना जंगल व काँटों भरे रास्ते से होकर इंद्रावती तट पर पहुँचा जा सकता है, जो अत्यंत दुर्गम मार्ग है। जबकि पुल के दूसरे सिरे से डेढ़ दो कि.मी. नदी के प्रवाह के साथ-साथ आगे बढ़ने पर एक अनुपम, बेहद खूबसूरत तथा रोमांचक एहसास दिलाता हुआ इंद्रावती के प्रवाह का सात भागों में विभक्त होकर प्रवाहित होना तथा उबड़-खाबड़ चट्टानों से गहराई में रजत प्रवाहमय मनोहारी जलप्रपात, जो किसी भी पर्यटक के मन को अपने प्राकृतिक सौंदर्य के चलते बांध सकने में सक्षम है।

यहाँ इन्द्रावती का दोनों पाट अत्यंत विस्तृत है तथा लगभग एक कि.मी. के क्षेत्र में पथरीली चट्टानें फैली हुई है। क्षेत्र के ग्रामीणों ने कहीं-कहीं मुख्य जलधारा के दोनों ओर सँकरे ऊँचे चट्टानों पर पुल के रूप में लकड़ी डाल रखा है। किसी भी स्थल पर खड़े होकर दूर निहारने पर नदी के दोनों ओर पहाड़ियाँ तथा जलप्रवाह के दोनों सिरों को जोड़ता हुआ पुल, जिसमें बस्तर की जीवनदायिनी कही जाने वाले इंद्रावती, रुके हुए जल पर तरु पल्लव की हरीतिमा युक्त परछाई अत्यंत मनोहारी दृश्य उत्पन्न करती है। नजरें घुमाते ही जहाँ चट्टानी भाग प्रारंभ होता है, अनियमित आकार के चट्टानों में सात अलग-अलग स्थलों पर जलप्रवाह के कारण जलमार्ग के रुप में गहरी खाईयाँ बनी हुई है तथा किसी नवयौवना के आँचल की भाँति लहराता हुआ जल प्रवाह इन चट्टानी कटावों के बीच से गहराई में गिरता हुआ अलग-अलग जलप्रपात बनाता है। फिर एक-एक कर सभी जलधाराएँ पुनः मिलकर जलप्रवाह के रुप में रेतीली किनारों से होता हुआ बहता चला जाता है एक नई दिशा की ओर।

सात धाराओं में विभक्त यह जलप्रपात, वर्षा के उफनते जलप्रवाह में अपना अस्तित्व खो देता है। पूरा चट्टानी भाग जलमग्न हो जाता है, जिसके कारण वर्षा के समय सातधार जलप्रपात का अस्तित्व लुप्त हो जाता है, एवं वर्षा ऋतु के तुरंत बाद सितंबर अक्टूबर से यहाँ का – अनुपम सौंदर्य देखने को मिलता है। वर्षा ऋतु के पश्चात् जलराशि भी अधिक रहती है, जहाँ जलप्रपात की ऊँचाई कम होने के बाद भी सप्त धाराओं में बँटकर नन्हें-नन्हें जलकणों की फुहार काफी ऊँचाई तक नजर आती है, जो निकट जाने पर अंतरतम तक शीतलता प्रदान करती है। दूर-दूर तक पथरीली चट्टानों का कटाव भी एक बारगी मन को बांध लेता है। प्रकृति के इस अनुपम उपहार सातधार का सौंदर्य एक स्थान से खड़े होकर चतुर्दिक निहारा जा सकता है। 

वर्तमान में इंद्रावती का जलस्तर अत्यंत कम हो जाने के कारण सातधार जलप्रपात का पर्यटन सितंबर-अक्टूबर से जनवरी तक करने पर यहाँ का सौंदर्य अपने यौवन पर रहता है, पश्चात् वर्षा के पूर्व तक जलप्रवाह अत्यंत क्षीण हो जाता है। सामान्यतः सातधार के नाम से पर्यटक नदी तथा पुल के निकट अर्द्धनिर्मित बाघ को ही देख आते हैं, जबकि यह अत्यंत रमणीक स्थल के साथ-साथ खूबसूरत पिकनिक स्पॉट भी है। सड़क से हटकर बीहड़ मार्ग पर जाने के कारण यहाँ किसी स्थानीय व्यक्ति की सहायता लेना श्रेयस्कर है।

सातधार जलप्रपात का पर्यटन समूह रुप में बारसूर के पुरातात्विक संग्रहालय, मामा भांजा मंदिर, बत्तीसा मंदिर, गणेश प्रतिमा आदि के साथ-साथ निकट नागफनी में नागमाता मंदिर, मिलकुलवाड़ा-हांदावाड़ा जलप्रपात, तुलारगुफा, समलूर का खजुराहो कालीन शिव मंदिर, दंतेवाड़ा दंतेश्वरी शक्तिपीठ, गुमरगुण्डा आश्रम आदि का पर्यटन एक साथ किया जा सकता है। विश्राम हेतु जिला मुख्यालय दंतेवाड़ा तथा व्यावसायिक स्थल गीदम निकट है, तथापि सातधार जलप्रपात का पर्यटन करते समय जलपान, चाय तथा भोजन के साथ जाना ही उचित है। यदि पर्यटक एक बार सातधार जलप्रपात का पर्यटन कर ले, तो यहाँ के बीहड़ जंगल, विस्तृत चट्टान क्षेत्र जिसमें सप्त धाराओं में बँटा हुआ इंद्रावती नदी का जलप्रवाह तथा समूह रुप में सातधार जलप्रपात का मनोहारी अनुपम सौंदर्य अविस्मरणीय होकर नयनपट से स्मृति पटल पर उतरता चला जाता है।

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बस्तरिया बाबू

बस्तरिया बाबू

बस्तर की जनजातीय संस्कृति, इतिहास और सामाजिक जीवन पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक। उनके लेख बस्तर के आदिवासी समाज की परंपराओं, पेन-परब संस्कृति, लोकजीवन और समकालीन मुद्दों को समझने का प्रयास करते हैं।

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