Jagdalpur, Bastar, Chhattisgarh

आदिवासी संघर्ष: दिशा, दशा और समाधान.

"हम आदिवासी इस देश के कुदरती मालिक हैं, फिर भी सबसे अधिक पीड़ित और शोषित क्यों हैं? नेतृत्व के संकट, संवैधानिक अधिकारों (PESA) और बिखरी हुई रणनीति का एक गहन और तथ्यात्मक विश्लेषण। पढ़ें आदिवासी समाज की समस्याओं का वास्तविक समाधान।"

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मैं एक ऐसी धरती का बेटा हूँ जहाँ पत्थरों में पुरखों की यादें और हवाओं में प्रकृति का संगीत बसता है। आज जब मैं अपनी कलम उठा रहा हूँ, तो यह केवल स्याही नहीं, बल्कि उन हज़ारों सालों के संघर्ष, दमन और अस्तित्व की लड़ाई की गूँज है जिसे मेरा समुदाय सदियों से झेल रहा है। हम आदिवासी, जो इस देश की मिट्टी के असली वारिस हैं, जिन्हें संवैधानिक रूप से ‘अनुसूचित जनजाति’ और सांस्कृतिक रूप से ‘प्रकृति पुत्र’ कहा जाता है, आज अपने ही घर में बेगाने क्यों हैं? यह प्रश्न केवल एक राजनीतिक विमर्श नहीं, बल्कि एक अस्तित्वगत संकट है।

हम कुदरत के मालिक हैं, जल-जंगल-जमीन के संरक्षक हैं, फिर भी आज हम ही सबसे अधिक पीड़ित, शोषित और विस्थापित हैं। हमारे पास आंदोलनों का एक लंबा इतिहास है—सिद्धू-कान्हू से लेकर टंट्या मामा और बिरसा मुंडा से लेकर वीर गुंडाधुर तक—लेकिन आज का यथार्थ यह है कि इतने संघर्षों के बाद भी हम समाधान की उस मंजिल तक नहीं पहुँच पा रहे हैं जहाँ हमारा हक सुरक्षित हो। हमें यह आत्ममंथन करना होगा कि आखिर कमी कहाँ रह गई है।


हमारे संघर्ष की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हमारी दिशा बिखरी हुई है। जब हम छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य को बचाने के लिए लड़ते हैं, तो उसी समय झारखंड या ओडिशा के किसी अन्य कोने में हमारा भाई एक अलग नाम और झंडे के नीचे अपनी जमीन बचा रहा होता है। आंदोलनों में ऊर्जा की कमी नहीं है, लेकिन उस ऊर्जा को एक सूत्र में पिरोने वाली एक राष्ट्रीय दृष्टि का अभाव है। हम टुकड़ों में लड़ रहे हैं, जबकि हमें दबाने वाली ताकतें संगठित और वैश्विक हैं। उदाहरण के तौर पर, जब किसी क्षेत्र में खनन परियोजना आती है, तो स्थानीय स्तर पर विरोध तो जबरदस्त होता है, लेकिन वह विरोध अक्सर कानूनी दांव-पेंचों और सरकारी आश्वासनों के जाल में उलझकर दम तोड़ देता है। हमारी लड़ाई तात्कालिक प्रतिक्रिया (Reactive) बनकर रह गई है, जबकि इसे एक दीर्घकालिक रणनीति (Proactive) होना चाहिए था। हम तब जागते हैं जब कुल्हाड़ी पेड़ की जड़ तक पहुँच जाती है, जबकि हमें उस नीति निर्माण की मेज पर होना चाहिए था जहाँ कुल्हाड़ी बनाने का फैसला लिया जाता है।


नेतृत्व का संकट आज हमारे समाज की एक कड़वी सच्चाई है। बाबा साहब अंबेडकर ने कहा था कि शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो। हमने शिक्षित होने की कोशिश की, संघर्ष भी किया, लेकिन संगठित होने के नाम पर हम कई खेमों में बंट गए। आज आदिवासी समाज के भीतर एक ‘नेतृत्व शून्य’ की स्थिति है। जो नेता मुख्यधारा की राजनीति में गए, वे अक्सर अपनी पार्टियों के बंधुआ मजदूर बनकर रह गए। वे विधानसभा और संसद में आदिवासियों के वोटों से पहुँचते हैं, लेकिन वहाँ उनकी आवाज पार्टी व्हिप के नीचे दब जाती है। समाज को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो ज़मीनी मुद्दों को समझे और जिसमें सत्ता की आँखों में आँखें डालकर सच बोलने का साहस हो। वर्तमान में हमारा नेतृत्व या तो अत्यधिक भावुक है या पूरी तरह सत्ता के अधीन। बौद्धिक नेतृत्व और ज़मीनी कार्यकर्ता के बीच की खाई इतनी चौड़ी हो गई है कि आम आदिवासी खुद को अकेला महसूस करता है।


कानूनी रूप से देखा जाए तो भारतीय संविधान ने हमें पांचवीं और छठी अनुसूची, पेसा (PESA) कानून और वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 जैसे शक्तिशाली हथियार दिए हैं। लेकिन दुखद पहलू यह है कि इन कानूनों का उपयोग बहुत कम हो पा रहा है। ग्राम सभा को संविधान ने जो शक्तियाँ दी हैं, वे कागजों पर तो ‘सुप्रीम’ हैं, लेकिन व्यवहार में एक तहसीलदार या वन विभाग का बीट गार्ड ग्राम सभा के प्रस्ताव को ठेंगा दिखा देता है। इसका कारण शिक्षा और कानूनी जागरूकता की कमी है।

हमारे लोग अपनी जमीन से प्यार करते हैं, लेकिन उस जमीन के मालिकाना हक के दस्तावेज़ और अदालती कार्यवाही की भाषा उन्हें समझ नहीं आती। जब तक एक आम आदिवासी यह नहीं जानेगा कि उसकी ‘ग्राम सभा’ के पास किसी भी विकास परियोजना को रोकने या अनुमति देने का संवैधानिक अधिकार है, तब तक शोषण जारी रहेगा। हमें वकील, नीति विश्लेषक और संविधान के जानकार पैदा करने होंगे जो हमारी पारंपरिक सभाओं को कानूनी जामा पहना सकें।


शिक्षा की कमी हमारे पिछड़ेपन की जड़ है, लेकिन यहाँ शिक्षा का मतलब केवल डिग्री लेना नहीं है। आज की शिक्षा प्रणाली हमें अपनी जड़ों से काट रही है। एक आदिवासी बच्चा जब स्कूल जाता है, तो उसे अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास के बारे में कुछ नहीं पढ़ाया जाता। नतीजा यह होता है कि वह अपनी पहचान को लेकर हीन भावना से भर जाता है। बाहरी हस्तक्षेप ने हमारी इस कमजोरी का खूब फायदा उठाया है। अलग-अलग विचारधाराओं वाले समूहों ने आदिवासियों को केवल ‘फुट सोल्जर’ या ‘वोट बैंक’ की तरह इस्तेमाल किया है। वामपंथी विचारधारा हो या दक्षिणपंथी, दोनों ने ही आदिवासियों को अपने एजेंडे का हिस्सा बनाया, लेकिन आदिवासियों का अपना मूल ‘आदिवासी दर्शन’ कहीं पीछे छूट गया। हम दूसरों की लड़ाई के मोहरे बन गए, जबकि हमें अपनी स्वयं की विचारधारा को मज़बूत करना था जो सामूहिकता और सह-अस्तित्व पर आधारित है।


आर्थिक कमजोरी हमारी सबसे बड़ी बेड़ी है। हम संसाधनों से भरपूर क्षेत्रों में रहते हैं, लेकिन गरीबी का सबसे क्रूर चेहरा भी वहीं दिखता है। हमारे जंगलों से निकलने वाला लोहा, कोयला और तांबा दुनिया को रोशन कर रहा है, लेकिन हमारे घरों में आज भी अंधेरा है। विस्थापन के नाम पर हमें कौड़ियों के दाम मुआवजा देकर अपनी जड़ों से उखाड़ दिया जाता है और बाद में वही लोग हमें शहरों की झुग्गियों में दिहाड़ी मजदूर के रूप में देखते हैं। हमने कभी अपनी ‘आदिवासी अर्थव्यवस्था’ को विकसित करने पर ध्यान नहीं दिया। हमारा लघु वनोपज (Minor Forest Produce) बिचौलियों के हाथों लूट लिया जाता है। जब तक आदिवासी समाज आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं होगा, उसका राजनीतिक और सामाजिक शोषण बंद नहीं होगा। हमें सहकारी समितियों और अपने उत्पादों के सीधे बाजार से जुड़ाव पर काम करना होगा ताकि हम याचक नहीं, बल्कि आर्थिक शक्ति बन सकें।


सांस्कृतिक टूटन ने हमारे समाज के भीतर की एकजुटता को भारी नुकसान पहुँचाया है। आदिवासी समाज कभी धर्म और जाति के ऊंच-नीच के चक्कर में नहीं पड़ा, लेकिन आज बाहरी धर्मों और संप्रदायों के प्रभाव में आकर हम आपस में ही लड़ने लगे हैं। ‘आदिवासी’ की मूल पहचान उसकी प्रकृति पूजा और पुरखा पद्धति है। जब हम अपनी जड़ों से कटते हैं, तो हमारी सामूहिक शक्ति कमज़ोर हो जाती है। यह सांस्कृतिक बिखराव हमें राजनीतिक रूप से भी कमज़ोर करता है क्योंकि अब हम एक समुदाय के रूप में नहीं, बल्कि अलग-अलग समूहों के रूप में देखे जाने लगे हैं। इसी के साथ राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमजोरी भी जुड़ी है। आरक्षित सीटें तो हैं, लेकिन उन सीटों पर बैठने वाले व्यक्ति की वफादारी अपने समाज के प्रति कम और अपनी राजनीतिक पार्टी के प्रति अधिक होती है। हमें ऐसे राजनीतिक विकल्पों की तलाश करनी होगी जो ‘आदिवासी हितों’ को दलगत राजनीति से ऊपर रखें।


आंदोलनों की बाढ़ है, पर रणनीति की कमी है। हम सड़कों पर उतरते हैं, नारे लगाते हैं, गिरफ्तारियाँ देते हैं, लेकिन नीतिगत स्तर पर दबाव बनाने में विफल रहते हैं। आधुनिक दुनिया में लड़ाई केवल सड़क पर नहीं, बल्कि मीडिया, डेटा और कोर्ट रूम में भी लड़ी जाती है। हमारे पास ऐसे थिंक-टैंक नहीं हैं जो सरकारी आँकड़ों को चुनौती दे सकें या वैकल्पिक विकास मॉडल पेश कर सकें। हम केवल ‘नहीं’ कहना जानते हैं, लेकिन ‘क्या होना चाहिए’ इसका ठोस ब्लूप्रिंट हमारे पास अक्सर नहीं होता। एकता की कमी एक और कड़वा सच है। उप-जातियों, क्षेत्रों और अलग-अलग संगठनों के अहंकार ने हमें छोटे-छोटे टापुओं में बाँट दिया है। जब तक एक भील का दर्द एक गोंद को महसूस नहीं होगा और एक मुंडा की लड़ाई में एक मिजो साथ नहीं खड़ा होगा, तब तक दिल्ली और राज्य की राजधानियाँ हमारी अनसुनी करती रहेंगी।


समाधान की दिशा:

आदिवासी समाज के अस्तित्व की इस लड़ाई में जब हम समाधान की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि यह केवल सरकारी योजनाओं या चंद नौकरियों का मामला नहीं है। यह एक पूरी सभ्यता को बचाने का प्रश्न है।

समाधान की पहली किरण आत्म-बोध से निकलती है। हमें उस हीन भावना के खोल को तोड़ना होगा जो बाहरी दुनिया ने हम पर थोपी है। समाधान की दिशा में सबसे पहला और अनिवार्य कदम है ‘बौद्धिक नेतृत्व’ का निर्माण। अब तक हमारे आंदोलनों में जोश की कमी नहीं रही, लेकिन होश और रणनीति की कमी ने हमें पीछे धकेला है। हमें अपने समाज के भीतर से ऐसे विशेषज्ञों की फौज तैयार करनी होगी जो संविधान की धाराओं को उतनी ही सहजता से समझें जितना वे जंगल की पगडंडियों को समझते हैं। जब तक हमारे पास अपने वकील, अपने योजनाकार, अपने सांख्यिकीविद और अपने पत्रकार नहीं होंगे, हम दूसरों के द्वारा तैयार किए गए ‘डेटा’ और ‘नैरेटिव’ के जाल में उलझे रहेंगे। समाधान का अर्थ है—अपनी कहानी खुद लिखना।


दस्तावेजीकरण और इतिहास का संरक्षण इस समाधान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हमारी बहुत सी विरासत ‘अलिखित’ है, जो बुजुर्गों की स्मृतियों के साथ खत्म हो रही है। समाधान तब स्थायी होगा जब हम अपनी वाचिक परंपराओं को आधुनिक अभिलेखों में बदल देंगे। यह केवल भावुकता नहीं है, बल्कि कानूनी लड़ाई का आधार है। जब हम अदालत में खड़े होते हैं, तो वहां ‘कहानियां’ नहीं, ‘साक्ष्य’ मांगे जाते हैं। हमें अपने रीति-रिवाजों, अपनी सीमांकन पद्धतियों और अपनी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था का इतना मजबूत दस्तावेजीकरण करना होगा कि कोई भी कानूनी दांव-पेंच उसे झुठला न सके। इसके साथ ही, ग्राम सभा को केवल एक औपचारिक बैठक से निकालकर एक ‘संवैधानिक शक्ति केंद्र’ के रूप में स्थापित करना होगा। समाधान की दिशा गाँव की उस चौपाल से होकर गुजरती है जहाँ पेसा (PESA) कानून की रूह बसती है। ग्राम सभा को यह समझना होगा कि वह केवल सरकारी फंड बांटने की एजेंसी नहीं है, बल्कि वह अपने क्षेत्र की जल, जंगल और जमीन के असली मालिक है।


आर्थिक समाधान की दिशा में हमें ‘सामुदायिक पूंजीवाद’ की ओर बढ़ना होगा। आदिवासी समाज स्वभाव से ही सामूहिकतावादी है, और यही हमारी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत है। हमें बिचौलियों पर निर्भरता खत्म कर अपने लघु वनोपज और कृषि उत्पादों के लिए स्वयं की ‘सप्लाई चेन’ विकसित करनी होगी। आज के दौर में ‘ब्रांडिंग‘ का बड़ा महत्व है। बस्तर का महुआ हो या झारखंड का शहद, जब ये हमारे अपने ब्रांड के नाम से वैश्विक बाजार में जाएंगे, तब जाकर आर्थिक गुलामी की कड़ियां टूटेंगी। हमें एक ऐसी ‘आदिवासी बैंकिंग और क्रेडिट प्रणाली‘ की आवश्यकता है जो संकट के समय हमारे लोगों को साहूकारों के चंगुल से बचा सके। आर्थिक मजबूती ही वह ढाल है जो हमें विस्थापन के समय बिकने या झुकने से रोकेगी। यह समाधान तब और व्यापक होगा जब हम अपनी पारंपरिक कौशल कला को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ेंगे, ताकि हमारी अगली पीढ़ी को मजदूरी के लिए पलायन न करना पड़े, बल्कि वे अपने ही संसाधनों के प्रबंधक बनें।


एक और महत्वपूर्ण आयाम है—राजनीतिक शुचिता और निर्दलीय वैचारिक पहचान। हमारे राजनीतिक प्रतिनिधित्व को ‘दलों की गुलामी‘ से मुक्त होना पड़ेगा। समाधान तब निकलेगा जब आरक्षित सीटों से चुनकर जाने वाले प्रतिनिधि सदन में किसी पार्टी के व्हिप से पहले अपने समाज के हितों को रखें। इसके लिए समाज को एक ऐसा ‘सोशल ऑडिट’ तंत्र विकसित करना होगा जो अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से हर पांच साल में सवाल पूछे। हमें राजनीति को केवल चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं रखना है, बल्कि ‘नीति निर्धारण’ (Policy Making) में अपनी पैठ बनानी है। समाधान का रास्ता मंत्रालयों के उन कमरों से होकर जाता है जहाँ हमारी जमीनों के पट्टे और खनन के सौदे तय होते हैं। वहां हमारा प्रतिनिधित्व केवल शारीरिक रूप से नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से भी होना चाहिए।


सांस्कृतिक एकता का पुनर्गठन इस पूरे समाधान की रीढ़ है। हमें उन सभी बाहरी विभाजनों को नकारना होगा जो हमें धर्म, संप्रदाय या उप-जातियों के नाम पर बांटते हैं। ‘आदिवासी’ एक वृहद पहचान है जो प्रकृति के साथ जुड़ाव से परिभाषित होती है। समाधान की दिशा में हमें अपनी भाषाओं को बचाना होगा, क्योंकि भाषा मरती है तो एक संस्कृति और उसके साथ जुड़ा पूरा ज्ञान तंत्र मर जाता है। अपनी बोलियों में शिक्षा, अपने लोकगीतों में विज्ञान और अपनी रूढ़ि प्रथाओं में न्याय ढूंढना ही वास्तविक समाधान है। अंततः, हमें एक ‘अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी नेटवर्क’ का हिस्सा बनना होगा। दुनिया भर के स्वदेशी समुदायों की समस्याएं एक जैसी हैं—चाहे वे अमेरिका के रेड इंडियंस हों या ऑस्ट्रेलिया के एबोरिजिनल्स। वैश्विक मंचों पर अपनी आवाज को साझा करना और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों का सहारा लेना हमारे स्थानीय आंदोलनों को एक नई धार देगा।


समाधान का अंतिम बिंदु ‘धैर्य और निरंतरता’ है। सदियों का शोषण चंद सालों के आंदोलन से खत्म नहीं होगा। यह एक लंबी वैचारिक यात्रा है। हमें आंदोलनों को केवल सड़कों पर शोर मचाने तक सीमित न रखकर, उन्हें पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं और न्यायालयों तक ले जाना होगा। जब हमारा युवा कलम और हल, दोनों को समान मजबूती से पकड़ेगा, तभी हम उस कुदरती मालिकियत को फिर से प्राप्त कर पाएंगे जिसके हम वास्तविक हकदार हैं। समाधान बाहर से नहीं आएगा, वह हमारे भीतर की संगठित शक्ति और स्पष्ट दृष्टि से उपजेगा।

बस्तरिया बाबू

बस्तरिया बाबू

बस्तर की जनजातीय संस्कृति, इतिहास और सामाजिक जीवन पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक। उनके लेख बस्तर के आदिवासी समाज की परंपराओं, पेन-परब संस्कृति, लोकजीवन और समकालीन मुद्दों को समझने का प्रयास करते हैं।

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