आज जब हम डॉ. भीमराव अंबेडकर जी की 135वीं जयंती मना रहे हैं, तो यह केवल उत्सव, रैली, नृत्य और गीतों तक सीमित रह जाए, यह हमारे लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए। विशेषकर आदिवासी युवा वर्ग के लिए यह दिन केवल गौरव का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का दिन है। जिस व्यक्ति ने जीवन भर शोषित, वंचित, दलित और आदिवासी समाज के अधिकारों के लिए संघर्ष किया, उसके विचारों को समझे बिना केवल प्रतीकात्मक उत्सव मनाना, कहीं न कहीं उनके संघर्ष का अपमान भी है।
आज गांवों, कस्बों और शहरों में देखने को मिलता है कि युवा बड़े उत्साह से जुलूस निकालते हैं, डीजे बजाते हैं, नाचते हैं, और इसे अपनी पहचान का हिस्सा मानते हैं। यह उत्साह गलत नहीं है, परंतु सवाल यह है कि क्या यह उत्साह ज्ञान में परिवर्तित हो रहा है? क्या यह ऊर्जा समाज निर्माण में लग रही है? क्या युवा यह जानते हैं कि बाबा साहब ने संविधान में उनके लिए कौन-कौन से अधिकार सुनिश्चित किए? यदि नहीं, तो यह उत्सव केवल बाहरी प्रदर्शन बनकर रह जाता है।
बाबा साहब ने कहा था – “शिक्षा वह शेरनी का दूध है, जो पियेगा वह दहाड़ेगा।” यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन है। शिक्षा को उन्होंने मुक्ति का सबसे बड़ा साधन माना। लेकिन आज का आदिवासी युवा, जो सबसे अधिक शिक्षा से सशक्त हो सकता है, वह अनेक बार शिक्षा से दूर होता जा रहा है। मोबाइल, सोशल मीडिया, तात्कालिक मनोरंजन, और गैर-जरूरी गतिविधियाँ उसकी ऊर्जा को खा रही हैं। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक नुकसान की ओर इशारा करती है।
आज भी आदिवासी क्षेत्रों में संसाधनों की कमी है, शिक्षा के अवसर सीमित हैं, और आर्थिक समस्याएँ बड़ी बाधा हैं। यह बात सही है। लेकिन इसके साथ यह भी उतना ही सच है कि आज जितनी योजनाएँ, छात्रवृत्तियाँ, आरक्षण और सुविधाएँ उपलब्ध हैं, उतनी पहले कभी नहीं थीं। समस्या केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि जागरूकता और प्राथमिकता की भी है। यदि युवा शिक्षा को अपना लक्ष्य बना ले, तो वह परिस्थितियों को चुनौती दे सकता है।
संविधान, जिसे बाबा साहब ने गढ़ा, वह केवल एक किताब नहीं है, बल्कि एक सामाजिक क्रांति का दस्तावेज है। उसमें समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व के सिद्धांत निहित हैं। आदिवासी समाज के लिए अनुसूचित जनजाति के रूप में विशेष प्रावधान, आरक्षण, वनाधिकार, पंचायत विस्तार अधिनियम (PESA), और अन्य कई अधिकार दिए गए हैं। लेकिन दुखद यह है कि बहुत से युवा इन अधिकारों से अनभिज्ञ हैं। वे अपने अधिकारों के लिए लड़ने की बजाय केवल प्रतीकात्मक गर्व में उलझे रहते हैं।
यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है – क्या केवल अधिकारों की जानकारी ही पर्याप्त है? नहीं। अधिकारों के साथ कर्तव्य भी आते हैं। यदि समाज का युवा वर्ग सक्रिय, जिम्मेदार और जागरूक नहीं होगा, तो अधिकार कागजों में ही सीमित रह जाएंगे। आज आवश्यकता है कि युवा संविधान को पढ़े, समझे, और उसे अपने जीवन में उतारे।
समाज का उत्थान केवल नेताओं या सरकारों के भरोसे नहीं हो सकता। यह काम युवाओं के कंधों पर होता है। लेकिन वर्तमान में यह देखने को मिलता है कि युवा वर्ग अपनी ऊर्जा का उपयोग सकारात्मक दिशा में कम कर रहा है। न तो वह सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय है, न ही शिक्षा, स्वास्थ्य, या जागरूकता के क्षेत्रों में अपनी भूमिका निभा रहा है। यह निष्क्रियता समाज को पीछे धकेल रही है।
आज का समय बदल गया है, और हर व्यक्ति को अपनी व्यक्तिगत उन्नति पर ध्यान देना चाहिए। यह तर्क आंशिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन यदि व्यक्तिगत उन्नति समाज से कटकर होगी, तो वह स्थायी नहीं होगी। बाबा साहब ने स्वयं व्यक्तिगत संघर्ष किया, लेकिन उसका उद्देश्य सामूहिक उत्थान था। इसलिए आदिवासी युवाओं को भी यह समझना होगा कि उनकी सफलता केवल उनकी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सफलता है।
एक और गंभीर समस्या दृष्टिगत होती है – अपनी परंपरा, संस्कृति और पहचान से दूरी। आदिवासी समाज की सबसे बड़ी ताकत उसकी संस्कृति, उसकी परंपराएँ, उसके त्योहार, उसकी भाषा और उसका सामुदायिक जीवन है। लेकिन आज का युवा कई बार इनसे दूर होता जा रहा है। वह अपनी जड़ों को छोड़कर बाहरी संस्कृति को अपनाने में गर्व महसूस करता है। यह परिवर्तन स्वाभाविक नहीं, बल्कि एक प्रकार का सांस्कृतिक अतिक्रमण है। समय के साथ परिवर्तन आवश्यक है, और नई चीजों को अपनाना गलत नहीं है। यह सही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह अपनाना संतुलित है? क्या हम अपनी पहचान को बचाते हुए आगे बढ़ रहे हैं, या पूरी तरह उसे खोते जा रहे हैं? यदि हमारी भाषा, हमारे रीति-रिवाज, हमारे त्योहार और हमारी पारंपरिक ज्ञान प्रणाली खत्म हो जाती है, तो हमारी पहचान भी धीरे-धीरे मिट जाएगी।
बाबा साहब का दृष्टिकोण केवल आधुनिकता तक सीमित नहीं था। वे वैज्ञानिक सोच, तार्किकता और प्रगतिशीलता के पक्षधर थे, लेकिन उन्होंने कभी अपनी पहचान छोड़ने की बात नहीं कही। उन्होंने कहा कि हमें अपनी कमजोरियों को पहचानकर उन्हें दूर करना चाहिए, लेकिन अपनी ताकतों को भी बचाकर रखना चाहिए।
आज आवश्यकता है कि आदिवासी युवा दोहरी जिम्मेदारी को समझे – एक तरफ उसे आधुनिक शिक्षा, तकनीक और ज्ञान को अपनाना है, और दूसरी तरफ अपनी संस्कृति और परंपरा को बचाना है। यह संतुलन ही उसे सशक्त बनाएगा।
सामाजिक कार्यों में भागीदारी की कमी भी एक बड़ा मुद्दा है। गांवों में होने वाले विकास कार्य, शिक्षा अभियान, स्वास्थ्य जागरूकता, वन अधिकारों की लड़ाई, या पंचायत स्तर की गतिविधियाँ – इनमें युवाओं की भागीदारी सीमित होती जा रही है। यदि युवा इन क्षेत्रों में सक्रिय नहीं होंगे, तो निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी आवाज कमजोर पड़ जाएगी सामाजिक कार्य केवल बड़े आंदोलनों तक सीमित नहीं होते। छोटे-छोटे प्रयास भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं – जैसे बच्चों को पढ़ाना, गांव में स्वच्छता अभियान चलाना, लोगों को उनके अधिकारों के बारे में बताना, या स्थानीय समस्याओं के समाधान में भाग लेना।
बाबा साहब का जीवन हमें यह सिखाता है कि परिवर्तन संघर्ष से आता है, और संघर्ष ज्ञान से मजबूत होता है। उन्होंने कभी भी आसान रास्ता नहीं चुना। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई की, समाज के विरोध का सामना किया, और अंततः एक ऐसा संविधान दिया जिसने देश को नई दिशा दी।
आज के आदिवासी युवा के सामने चुनौतियाँ अलग हैं, लेकिन अवसर भी बहुत हैं। यदि वह शिक्षा को अपनाए, अपने अधिकारों को समझे, सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाए, और अपनी संस्कृति को बचाए, तो वह समाज को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकता है।
बाबा साहब की जयंती केवल उत्सव का दिन नहीं, बल्कि संकल्प का दिन होना चाहिए। यह दिन हमें यह याद दिलाता है कि हम कहाँ से आए हैं, हमें कहाँ जाना है, और उस रास्ते में हमारी क्या भूमिका है।
यदि आदिवासी युवा इस दिन यह संकल्प ले कि वह शिक्षा को प्राथमिकता देगा, अपने अधिकारों को समझेगा, समाज के लिए काम करेगा, और अपनी संस्कृति को बचाएगा, तो यही बाबा साहब के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
जो केवल नाचते हैं, वे कुछ समय के लिए दिखते हैं, जो पढ़ते हैं, समझते हैं और समाज के लिए काम करते हैं, वही इतिहास बनाते हैं।



