Jagdalpur, Bastar, Chhattisgarh

बस्तर नक्सल मुक्त – क्या अब बिना विरोध के जंगल और जमीन का दोहन होगा?

बस्तर नक्सल मुक्त - बस्तर अब नक्सलवाद से मुक्त हो रहा है, लेकिन क्या यहाँ के जल, जंगल और जमीन सुरक्षित हैं? जानिए ग्राउंड रियलिटी 'बस्तरिया बाबू' की जुबानी। बैलाडीला और रावघाट जैसे संघर्षों और पर्यावरण संकट पर एक गहरी नज़र।

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जोहार।

आज जब मैं अपनी इस माटी की बात कर रहा हूँ, तो मेरे कानों में उन विशाल मशीनों की गूँज अभी से सुनाई दे रही है जो बस्तर के शांत सीने को चीरने के लिए तैयार खड़ी हैं। ‘नक्सल मुक्त बस्तर’ का नारा शहर के ड्राइंग रूम में बैठे लोगों के लिए विकास का एक नया अध्याय हो सकता है, लेकिन हम आदिवासियों के लिए यह एक बहुत बड़े इम्तिहान की घड़ी है। दशकों तक हमें यह कहकर डराया गया कि नक्सली विकास नहीं होने दे रहे। आज जब वे पीछे हट रहे हैं, तो सवाल खड़ा होता है कि अब जो विकास आएगा, वह किसका चेहरा लेकर आएगा? क्या वह चेहरा हमारे जैसा होगा, या वह उन बड़े घरानों का होगा जो बस्तर की हर पहाड़ी को केवल करोड़ों टन लोहे का ढेर समझते हैं?


बस्तर का इतिहास केवल हिंसा का इतिहास नहीं है, बल्कि यह प्रतिरोध और अपने अस्तित्व को बचाए रखने की लड़ाई का लंबा सफरनामा है। आप इसे केवल पिछले 30-40 सालों के चश्मे से मत देखिए। हमारी लड़ाई तो तब भी थी जब अंग्रेज यहाँ की कीमती लकड़ियों पर नजर गड़ाए बैठे थे। गुंडाधुर का विद्रोह याद है न? वह विद्रोह बंदूकों के लिए नहीं, बल्कि अपनी जमीन और स्वाभिमान के लिए था। आज जब ‘नक्सल मुक्त’ होने की बात होती है, तो हमें डर लगता है कि कहीं यह ‘आदिवासी मुक्त’ होने की प्रक्रिया की शुरुआत तो नहीं? क्या अब हमारी ग्राम सभाओं को यह कहकर दरकिनार कर दिया जाएगा कि “अब तो कोई खतरा नहीं है, तो जमीन देने में हर्ज क्या है?”


बैलाडीला की उन ऊँची पहाड़ियों को देखिए। दुनिया कहती है कि वहां से निकलने वाला लोहा दुनिया का सबसे बेहतरीन लोहा है। लेकिन क्या कभी किसी ने उन पहाड़ियों की तलहटी में रहने वाले आदिवासियों की आँखों में झाँका है? बैलाडीला की पहाड़ी नंबर 13 (नंदराज पहाड़ी) का संघर्ष हमें याद है। वहां हमारे लोग इसलिए खड़े हुए थे क्योंकि वह पहाड़ी हमारे लिए सिर्फ पत्थर नहीं, बल्कि हमारे पेन पुरखों का निवास स्थान थी। जब धर्म और आस्था के नाम पर शहरों में बड़े-बड़े बवाल होते हैं, तब तो सब साथ खड़े होते हैं, लेकिन जब एक आदिवासी अपनी पहाड़ी और अपने देवता को बचाने के लिए खड़ा होता है, तो उसे ‘विकास विरोधी’ या ‘नक्सल प्रभावित’ बताकर चुप करा दिया जाता है। अब जब नक्सली प्रभाव कम होगा, तो क्या सरकार हमारी इन आस्थाओं का सम्मान करेगी, या इसे अंधविश्वास बताकर वहां खनन की अनुमति दे दी जाएगी?


यही हाल रावघाट का है। भिलाई स्टील प्लांट की भूख मिटाने के लिए रावघाट की पहाड़ियों को अपनी बलि देनी पड़ रही है। सालों से वहां के गांवों में तनाव है। रेल लाइन बिछ रही है, जिसे कहा जा रहा है कि यह आदिवासियों की सुविधा के लिए है। लेकिन हम जानते हैं कि वह रेल लाइन आदिवासियों को शहर ले जाने के लिए नहीं, बल्कि हमारी पहाड़ियों को काटकर बाहर भेजने के लिए है। रावघाट के संघर्ष में हमारे लोगों ने क्या मांगा था? सिर्फ इतना ही तो कि हमारी खेती की जमीन बच जाए, हमारे पवित्र स्थल सुरक्षित रहें। लेकिन सुरक्षा बलों की तैनाती और नक्सलियों की मौजूदगी के बीच वह संवाद कभी हो ही नहीं पाया। अब जब बंदूकें हटने का दावा किया जा रहा है, तो क्या प्रशासन बिना वर्दी के, बिना डर के उन ग्रामीणों के बीच बैठकर उनकी बात सुनेगा? या फिर अब ‘बिना विरोध के दोहन’ का रास्ता और आसान हो जाएगा क्योंकि अब विरोध करने वाले को नक्सली कहकर बदनाम करने का बहाना भी खत्म हो जाएगा?


हमें पेसा (PESA) कानून और वनाधिकार अधिनियम (FRA) की बड़ी-बड़ी बातें सुनाई जाती हैं। कागजों पर ग्राम सभा को ‘सुप्रीम’ बताया गया है। लेकिन हकीकत यह है कि जब भी किसी बड़े प्रोजेक्ट की बात आती है, ग्राम सभा के प्रस्तावों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया जाता है। अक्सर फर्जी ग्राम सभाएं बुलाई जाती हैं, जहाँ पुलिस के पहरे में चंद लोगों के हस्ताक्षर ले लिए जाते हैं। क्या ‘नक्सल मुक्त बस्तर’ में यह प्रक्रिया बदलेगी? क्या अब वाकई कलेक्टर साहब और बड़े अफसर हमारे गांव के बुजुर्गों के साथ पलाश के पेड़ के नीचे बैठकर पूछेंगे कि “काका, आपकी जमीन का क्या करें?”


ग्राउंड रियलिटी यह है कि बस्तर का आदिवासी अब और अधिक जागरूक हो गया है। उसने देख लिया है कि विकास की इस दौड़ में वह सिर्फ एक मजदूर बनकर रह गया है। एनएमडीसी (NMDC) जैसी बड़ी कंपनियों के आसपास की बस्तियों को देखिए—एक तरफ चकाचौंध है, दूसरी तरफ धूल और धुएँ में सांस लेता हमारा समाज। क्या इसे ही विकास कहते हैं? जब तक बस्तर की संपदा का बड़ा हिस्सा यहाँ के स्थानीय लोगों की शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्यमिता पर खर्च नहीं होगा, तब तक कोई भी विकास हमारे लिए ‘दोहन’ ही कहलाएगा।


आज बस्तर के सामने दो रास्ते हैं। एक रास्ता वह है जहाँ नक्सली हिंसा खत्म हो या हो चुकी है और उसकी जगह लोकतांत्रिक संवाद ले। जहाँ आदिवासियों के हक के लिए लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेलों में न ठूंसा जाए, बल्कि उन्हें सुना जाए। दूसरा रास्ता वह है जिसे मैं ‘कॉरपोरेट कब्जा’ कहता हूँ, जहाँ पहाड़ियों को नंगा कर दिया जाए, नदियों का पानी लाल कर दिया जाए और आदिवासियों को शहरों की झुग्गियों में विस्थापित होने के लिए छोड़ दिया जाए। अगर दूसरा रास्ता चुना गया, तो यकीन मानिए, शांति केवल अस्थायी होगी। असंतोष की आग बंदूकों से नहीं, बल्कि न्याय से बुझती है।


बस्तर अब अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता है। हमें अपनी इमली, अपने महुआ, अपनी कोसा शिल्पकला और अपने कोदो-कुटकी पर नाज है। हमें ऐसी फैक्ट्रियां चाहिए जहाँ हमारे बच्चे मैनेजर बनें, न कि केवल दरबान। हमें ऐसे अस्पताल चाहिए जहाँ हमारी अपनी भाषा (गोंडी, हलबी) में बात करने वाला स्टाफ हो। अगर ‘नक्सल मुक्त’ होने का मतलब यह सब है, तो हम इस बदलाव का स्वागत करते हैं। लेकिन अगर इसका मतलब केवल खदानों का रास्ता साफ करना है, तो यह हमारे अस्तित्व पर सबसे बड़ा हमला होगा। बिना विरोध के दोहन की मंशा रखने वालों को यह जान लेना चाहिए कि बस्तर की मिट्टी में अब भी वह जज्बा जिंदा है, जो अपनी जमीन के लिए झुकना नहीं जानता।

अब मैं उस दर्द की बात करता हूँ जिसे बस्तर की नदियां सालों से चुपचाप सह रही हैं। जब हम ‘नक्सल मुक्त’ बस्तर में बेरोकटोक दोहन की आशंका जताते हैं, तो उसका सबसे भयावह चेहरा यहाँ के जल और पर्यावरण के विनाश के रूप में उभरता है। बस्तर की जीवनरेखा कही जाने वाली इंद्रावती और उसकी सहायक नदियां आज सिसक रही हैं।


बैलाडीला की खदानों से निकलने वाले लौह अयस्क की धुलाई ने शंखिनी और डंकिनी नदियों का रंग दशकों पहले ही लाल कर दिया था। हम बस्तरिया लोग जो कभी इन नदियों के पानी को अमृत समझकर पीते थे, आज उसे छूने से भी डरते हैं। यह सिर्फ पानी का लाल होना नहीं है, यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य का कत्ल है। खनन से निकलने वाले भारी तत्व और केमिकल हमारे खेतों में जमा हो रहे हैं, जिससे हमारी उपजाऊ जमीन बंजर होती जा रही है। अगर नक्सलवाद के खात्मे के बाद खनन की रफ्तार और बढ़ी, तो क्या प्रशासन के पास इन नदियों को बचाने का कोई ब्लूप्रिंट है? या फिर ‘विकास’ की वेदी पर बस्तर की प्यास की बलि चढ़ा दी जाएगी?


आज इंद्रावती का जलस्तर हर गर्मी में खतरनाक तरीके से नीचे गिर जाता है। एक तरफ ओडिशा के बांधों ने उसका रास्ता रोका है, तो दूसरी तरफ बस्तर के अंदरूनी इलाकों में होने वाले अंधाधुंध दोहन ने उसके प्राकृतिक बहाव को नुकसान पहुँचाया है। जब जंगल कटते हैं, तो पहाड़ों की पानी सोखने की क्षमता खत्म हो जाती है। परिणाम यह है कि जो बस्तर अपनी हरियाली और नमी के लिए जाना जाता था, वह अब जल संकट की ओर बढ़ रहा है। ‘नक्सल मुक्त’ होने के बाद अगर बड़ी-बड़ी स्टील और बिजली परियोजनाएं बिना किसी पर्यावरण ऑडिट के यहाँ पैर पसारती हैं, तो पानी का संकट और गहराएगा। फैक्ट्रियों को पानी चाहिए, और वह पानी हमारे हिस्से की नदियों और भूजल से ही निकाला जाएगा।


प्रदूषण केवल पानी तक सीमित नहीं है। बस्तर की स्वच्छ हवा, जिसमें कभी महुआ और सल्फी की खुशबू होती थी, अब डस्ट और धुएं से भरी जा रही है। खनन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले आदिवासियों को सांस की बीमारियां और चर्म रोग विरासत में मिल रहे हैं। क्या यह विडंबना नहीं है कि जिस बस्तर की संपदा से देश के बड़े-बड़े शहर चमक रहे हैं, वहां का आदिवासी शुद्ध पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहा है? बिना विरोध के दोहन का सबसे बड़ा खतरा यही है—कि कोई इन नदियों का पक्ष लेने वाला नहीं बचेगा।


अगर हमें वाकई एक खुशहाल और शांत बस्तर चाहिए, तो हमें अपनी नदियों के नीलेपन को लौटाना होगा। विकास ऐसा हो जो हमारी प्यास न छीने। ‘नक्सल मुक्त’ बस्तर में अगर नदियां और प्रदूषित हुईं, तो वह शांति हमारे किसी काम की नहीं होगी। हमें अपनी माटी की सुरक्षा के साथ-साथ अपने जल और हवा की पवित्रता को भी बचाना होगा।


अगली बार जब आप बस्तर आएं, तो केवल चित्रकोट का जलप्रपात देखकर वापस मत जाइएगा। उन गांवों में भी जाइएगा जहाँ लोग आज भी डरे हुए हैं कि कल सुबह कहीं कोई नोटिस न आ जाए कि उनकी जमीन अब उनकी नहीं रही। बस्तर को बंदूक मुक्त कीजिए, लेकिन उसे उसकी आत्मा यानी उसकी जमीन से मुक्त मत कीजिए।

अंत में, मैं बस यही कहूँगा कि बस्तर का ‘नक्सल मुक्त’ होना हमारे लिए एक ऐतिहासिक अवसर है, लेकिन यह अवसर ‘छूट’ (Open Season) नहीं बनना चाहिए। असली शांति बंदूकों के शांत होने से नहीं, बल्कि आदिवासियों के मन से ‘बेदखली के डर’ के खत्म होने से आएगी। यदि नक्सलवाद के जाने के बाद का खालीपन केवल बड़े कॉर्पोरेट घरानों और अनियंत्रित खनन से भरा गया, तो यह बस्तर की आत्मा के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात होगा।


समाधान बहुत सीधा है: विकास का रिमोट कंट्रोल बस्तर के आदिवासियों के हाथों में हो। ग्राम सभाओं को केवल कागजी मोहरा न बनाया जाए, बल्कि उन्हें जल, जंगल और जमीन के प्रबंधन में वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति दी जाए। हमें ऐसा मॉडल चाहिए जहाँ लोहे की खदानों से पहले स्कूलों की छतें पक्की हों, जहाँ नदियों को प्रदूषित करने वाली कंपनियों पर कड़ा जुर्माना लगे और वह पैसा सीधे प्रभावित गांवों के स्वास्थ्य पर खर्च हो।


बस्तर को ‘दोहन’ की नहीं, ‘संवर्धन’ की जरूरत है। अगर सरकार हमारी संस्कृति, हमारी आस्था के केंद्रों और हमारे पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए हाथ बढ़ाएगी, तो हम कंधे से कंधा मिलाकर चलेंगे। लेकिन अगर ‘बिना विरोध’ का मतलब हमारी चुप्पी समझ लिया गया, तो याद रखिएगा कि शांत दिखने वाले पहाड़ के अंदर भी लावा होता है। हम शांति चाहते हैं, सम्मान के साथ। हम प्रगति चाहते हैं, अपनी जड़ों के साथ। बस्तर की पहचान उसके खनिजों से नहीं, उसके लोगों और उसके घने जंगलों से है—इसे बचाए रखना ही सच्ची जीत होगी।

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बस्तरिया बाबू

बस्तरिया बाबू

बस्तर की जनजातीय संस्कृति, इतिहास और सामाजिक जीवन पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक। उनके लेख बस्तर के आदिवासी समाज की परंपराओं, पेन-परब संस्कृति, लोकजीवन और समकालीन मुद्दों को समझने का प्रयास करते हैं।

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