!! गण्डोदीप (भाग-१) !!
परिचय और भौगोलिक विस्तार
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गण्डोदीप: कोयतुर सभ्यता, दर्शन और आदिम चेतना का महावृत्तांत ।
Table of Contents
सेवा जोहार!
!! नर्मदा ता तीरे-तीरे, कोयतुर कोयामुरी दीपे !!
कोयतुर संस्कृति के प्राचीन गीतों और लोक-गाथाओं में एक पंक्ति अक्सर गूँजती है— “नर्मदा ता तीरे-तीरे, कोयतुर कोयामुरी दीपे”। इसका अर्थ केवल यह नहीं है कि कोयतुर समुदाय नर्मदा नदी के तट पर रहता था, बल्कि यह उस आदिम सत्य की घोषणा है जहाँ नर्मदा (रेवा माई) को सभ्यता की धमनियों के रूप में पूजा जाता था और यह संपूर्ण भू-भाग ‘कोयामुरी दीप’ या ‘गण्डोदीप’ के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखता था। आज के आधुनिक युग में हम सीमाओं को मानचित्रों पर खिंची हुई लकीरों, कटीले तारों और राजनैतिक संधियों के रूप में देखते हैं। ये सीमाएँ अक्सर युद्धों के रक्त और शासकों के अहंकार से तय होती हैं। परंतु, गण्डोदीप के उस स्वर्णिम काल में सीमाओं की परिभाषा पूर्णतः भिन्न और अत्यंत पवित्र थी।
उस समय सीमाएँ ‘पेन’ (प्राकृतिक शक्तियों) द्वारा निर्धारित की जाती थीं। कोयतुर दर्शन के अनुसार, जहाँ से एक नदी का जल-प्रवाह बदलता था या जहाँ एक पर्वत श्रृंखला अपनी गोद फैलाती थी, वहीं से एक सांस्कृतिक सीमा का आरंभ होता था।
नदियाँ सीमा नहीं, सेतु थीं: नर्मदा, गोदावरी और इंद्रावती जैसी नदियाँ राज्यों को बांटती नहीं थीं, बल्कि वे ‘कोया पुनेम’ के न्याय को एक तट से दूसरे तट तक पहुँचाने का मार्ग थीं।
पेन शक्तियों का संरक्षण: हर सीमा पर एक ‘पेन’ (प्राकृतिक शक्ति या पूर्वज देव) का वास माना जाता था, जो यह सुनिश्चित करता था कि मनुष्य अपनी सीमाओं का अतिक्रमण न करे और प्रकृति के संतुलन को न बिगाड़े।
अक्सर इतिहासकार गण्डोदीप को एक ‘क्षेत्र’ या ‘जंगल’ कहकर संबोधित करने की भूल करते हैं, लेकिन वास्तविकता में यह एक ‘संपूर्ण सांस्कृतिक महाद्वीप’ था।
सांस्कृतिक अखंडता: हिमालय की बर्फीली वादियों से लेकर हिंद महासागर (कोवुरय सागर) की लहरों तक फैला यह भू-भाग भाषाई विविधता के बावजूद एक ही दार्शनिक सूत्र— ‘सेवा’— से बंधा था। यहाँ का प्रशासन केंद्रीकृत नहीं बल्कि विकेंद्रीकृत था, जहाँ हर ‘गोटुल’ अपने आप में एक ज्ञान का केंद्र था और हर ‘शंभूसेक’ न्याय का जीवंत स्तंभ।
कोयामुरी दीप की व्यापकता: इसे ‘कोयामुरी दीप’ इसलिए कहा गया क्योंकि यहाँ ‘कोया’ (मनुष्य/आदिम मानव) का जन्म और संस्कार हुआ। यह वह भूमि थी जहाँ मनुष्य ने सबसे पहले प्रकृति के साथ ‘सगा’ (रिश्ता) बनाना सीखा।
जब हम आज इतिहास के पन्ने पलटते हैं, तो हमें राजाओं की वंशावली और किलों के घेराव की कहानियाँ मिलती हैं। लेकिन गण्डोदीप का इतिहास मिट्टी की गंध और पूर्वजों की यादों में दर्ज है। यह वह समय था जब मनुष्य ने लोहे की तलवारों से पहले ज्ञान के ‘त्रिशूल’ (मूंदमून्दशूल) को अपनाया था। यह विस्तार हमें याद दिलाता है कि हम उस विरासत के उत्तराधिकारी हैं जहाँ भूगोल का निर्माण पहाड़ों ने किया था और संस्कृति का निर्माण नदियों के कल-कल संगीत ने। गण्डोदीप की यह यात्रा हमें वर्तमान की कृत्रिम सीमाओं से परे ले जाकर उस आदिम स्वतंत्रता और प्राकृतिक गौरव से परिचय कराती है, जो आज भी बस्तर के अबुझमाड़ से लेकर सतपुड़ा की कंदराओं तक जीवित है।
गण्डोदीप क्या है?
गोंडी परंपरा और कोयतुर दर्शन में “गण्डोदीप” केवल एक भौगोलिक नाम नहीं है, बल्कि यह सृष्टि, प्रकृति और मानव समुदाय के उद्भव से जुड़ी गहरी वैचारिक अवधारणा है। इस शब्द की व्याख्या करते समय उसके शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ उसके दार्शनिक और सांस्कृतिक संदर्भों को समझना आवश्यक है।
शाब्दिक अर्थ और शब्द-व्युत्पत्ति –
गोंडी भाषा और लोकमान्यताओं के अनुसार “गण्डोदीप” दो मूल तत्वों से निर्मित है – गण्ड और दीप।
गण्ड शब्द का आशय केवल समूह या समुदाय से नहीं, बल्कि उस सामूहिक शक्ति से भी है जो प्रकृति और समाज दोनों को संतुलित करती है। कई गोंडी कथाओं में “गण्ड” को ऊर्जा के स्रोत या उस केंद्र के रूप में देखा जाता है जहाँ से जीवन की गति और चेतना का प्रवाह शुरू होता है। यह सामूहिकता, संगठन और जीवंतता का प्रतीक माना जाता है।
दीप का अर्थ यहाँ सामान्य दीपक नहीं, बल्कि प्रकाश से भरा हुआ भू-भाग या द्वीप है। यह वह स्थान है जो ज्ञान, जीवन और प्रकृति के संतुलन का केंद्र हो। इस तरह “गण्डोदीप” का शाब्दिक अर्थ हुआ, ऐसा प्रकाशमान भू-भाग जहाँ समूह की ऊर्जा और सृष्टि की चेतना एक साथ प्रकट होती है।
दार्शनिक अर्थ और गोंडी दृष्टिकोण –
गोंडी दर्शन प्रकृति-केंद्रित है। इसमें धरती को जीवित सत्ता माना गया है और मानव को उसका एक अंश। “गण्डोदीप” की अवधारणा इसी सोच को प्रकट करती है। इसे उस आदिम भूमि के रूप में देखा जाता है जहाँ से जीवन का क्रम शुरू हुआ और जहाँ प्रकृति तथा मानव के बीच संतुलन की मूल व्यवस्था बनी।
गोंडी कथाओं में “कोयामुरी दीप” या “गण्डोदीप” को अक्सर ऐसी धरती के रूप में वर्णित किया जाता है जहाँ आदिम समुदायों ने पहली बार सामाजिक संरचना, पेन-परब परंपराएँ और प्रकृति-आधारित जीवन पद्धति विकसित की। यहाँ “दीप” केवल भौतिक भूमि नहीं, बल्कि चेतना का क्षेत्र भी है, जहाँ से संस्कृति, ज्ञान और परंपराओं का प्रकाश फैलता है।
इस दार्शनिक दृष्टि में सृष्टि का अर्थ केवल जैविक उत्पत्ति नहीं, बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक विकास भी है। इसलिए गण्डोदीप को आदिवासी पहचान, स्मृति और सांस्कृतिक निरंतरता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
भू-वैज्ञानिक संदर्भ और आधुनिक विज्ञान –
आधुनिक भू-विज्ञान में “गोंडवाना लैंड” (Gondwana Land) एक प्राचीन महाद्वीप के रूप में जाना जाता है, जो करोड़ों वर्ष पहले अस्तित्व में था और बाद में विभिन्न महाद्वीपों में विभाजित हो गया। भारत, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, अंटार्कटिका और दक्षिण अमेरिका इसके हिस्से माने जाते हैं।
गोंडी परंपरा में “गण्डोदीप” या “कोयामुरी दीप” को इसी आदिम भू-भाग से जोड़कर देखा जाता है। लोकविश्वासों में यह वह भूमि मानी जाती है जो प्राचीन काल में समुद्र से उभरी और जहाँ जीवन तथा समुदायों की शुरुआत हुई। यहाँ यह समझना जरूरी है कि वैज्ञानिक दृष्टि और पारंपरिक मान्यताएँ अलग-अलग पद्धतियों से दुनिया को समझती हैं। विज्ञान भू-आकृतिक प्रक्रियाओं और जीवाश्म प्रमाणों के आधार पर गोंडवाना महाद्वीप का अध्ययन करता है, जबकि गोंडी दर्शन इसे सांस्कृतिक स्मृति और आध्यात्मिक इतिहास के रूप में देखता है।
सांस्कृतिक महत्व –
गण्डोदीप की अवधारणा केवल इतिहास या भूगोल तक सीमित नहीं है। यह आदिवासी समुदायों के लिए पहचान और अस्तित्व का आधार भी है। कई गोंडी गीतों, कथाओं और अनुष्ठानों में आदिम भूमि का उल्लेख मिलता है, जो लोगों को उनके पूर्वजों और प्रकृति से जोड़ता है। इस दृष्टि में धरती केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवनदायिनी माता है, और गण्डोदीप उसका वह रूप है जहाँ मानव और प्रकृति का मूल संबंध स्थापित हुआ।
इस प्रकार “गण्डोदीप” को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है। पहला, शाब्दिक रूप में यह एक प्रकाशमान भू-भाग या ऊर्जा का केंद्र है। दूसरा, दार्शनिक रूप में यह सामूहिक चेतना और प्रकृति-संतुलन का प्रतीक है और तीसरा, भू-वैज्ञानिक संदर्भ में यह गोंडवाना महाद्वीप से जुड़ी सांस्कृतिक स्मृति को दर्शाता है। गोंडी परंपरा में यह अवधारणा केवल अतीत की कथा नहीं, बल्कि वर्तमान में भी समुदायों की सांस्कृतिक पहचान और विश्व-दृष्टि को आकार देती है। इसलिए “गण्डोदीप” को समझना गोंडी दर्शन, आदिवासी इतिहास और प्रकृति-आधारित जीवन दृष्टि को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
गण्डोदीप का भौगोलिक विस्तार: हिमालय से समुद्र तक
कोयतुर परंपरा में गण्डोदीप का विचार केवल एक सीमित भू-भाग का वर्णन नहीं करता, बल्कि उस विशाल सांस्कृतिक और प्राकृतिक क्षेत्र की स्मृति है जिसे प्राचीन लोकगीतों, पाटा और मौखिक इतिहास में सहेजकर रखा गया है। इन परंपराओं के अनुसार, गण्डोदीप की सीमाएँ आज के आधुनिक राष्ट्र-राज्यों या राजनीतिक नक्शों से कहीं अधिक व्यापक थीं। यह एक ऐसी भूमि मानी जाती है जहाँ प्रकृति, समाज और आध्यात्मिक जीवन एक साथ विकसित हुए।
उत्तर की सीमा: हिमालय और शिवालिक का क्षेत्र –
कोयतुर लोककथाओं में गण्डोदीप की उत्तरी सीमा हिमालय की तलहटी और शिवालिक की पहाड़ियों तक बताई जाती है। यहाँ पहाड़ केवल भौगोलिक अवरोध नहीं थे, बल्कि प्रकृति की रक्षा-रेखा माने जाते थे। हिमालय को कई गोंडी कथाओं में धरती का “माथा” कहा गया है, जहाँ से नदियाँ जन्म लेकर दक्षिण की ओर बहती हैं और पूरे भू-भाग को जीवन देती हैं। शिवालिक क्षेत्र को उन प्राचीन मार्गों का हिस्सा माना जाता है जहाँ से समुदायों का आवागमन और सांस्कृतिक संपर्क बना रहा।
दक्षिण की सीमा: हिंद महासागर और कोयतुर सागर –
गण्डोदीप की दक्षिणी सीमा हिंद महासागर तक फैली हुई मानी जाती है। कुछ मौखिक परंपराओं में इसे “कोयतुर सागर” के रूप में भी संबोधित किया गया है, जो समुद्र को केवल जलराशि नहीं बल्कि जीवन के विस्तार और समापन का प्रतीक बनाता है। समुद्र को प्राचीन गीतों में उस स्थान के रूप में देखा जाता है जहाँ नदियाँ अपनी यात्रा पूरी करती हैं और प्रकृति का चक्र पूर्ण होता है। इस दृष्टि में समुद्र, धरती और आकाश के बीच संतुलन का अंतिम बिंदु है।
हृदय स्थल: विंध्याचल, सतपुड़ा और दंडकारण्य –
गण्डोदीप का केंद्रीय क्षेत्र विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वतमालाओं के बीच का विशाल वन क्षेत्र माना जाता है। लोकभाषा में सतपुड़ा को “सत्ता का पुड़ा” भी कहा जाता है, जिसका अर्थ उस शक्ति-स्थल से है जहाँ प्रकृति की ऊर्जा सबसे अधिक मानी जाती थी। दंडकारण्य का अभेद्य वन इस भूमि का हृदय था, जहाँ घने जंगल, पहाड़ और नदियाँ मिलकर एक प्राकृतिक किला बनाते थे।
यही क्षेत्र कोयतुर समुदायों की सांस्कृतिक गतिविधियों, अनुष्ठानों और सामुदायिक जीवन का केंद्र माना गया। गोटुल जैसी सामाजिक संस्थाएँ भी इसी भू-भाग में विकसित हुईं, जहाँ युवा पीढ़ी को जीवन-मूल्य, प्रकृति के नियम और समुदाय की परंपराएँ सिखाई जाती थीं।
‘ह्युंग खण्डी दीपा’: पाँच खंडों की अवधारणा –
प्राचीन कोयतुर पाटा में गण्डोदीप को पाँच प्रमुख खंडों में विभाजित बताया गया है, जिन्हें सामूहिक रूप से “ह्युंग खण्डी दीपा” कहा गया। यह विभाजन आधुनिक प्रशासनिक सीमाओं की तरह नहीं था, बल्कि प्राकृतिक और सांस्कृतिक आधार पर किया गया था। हर खंड की अपनी भौगोलिक विशेषता, देवस्थल और सामुदायिक परंपराएँ थीं।
इन खंडों के बीच नदियाँ और पहाड़ प्राकृतिक सीमाएँ बनाते थे, जबकि उत्सव, व्यापार और विवाह संबंध इन्हें आपस में जोड़ते थे। इस व्यवस्था से यह स्पष्ट होता है कि गण्डोदीप की अवधारणा केवल भूमि के विस्तार का नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक नेटवर्क का प्रतीक थी।
नदियाँ: गण्डोदीप की जीवन रेखाएँ –
नर्मदा, गोदावरी, महानदी और इंद्रावती जैसी नदियाँ गण्डोदीप की आत्मा मानी जाती थीं। लोकगीतों में इन्हें “जीवन की धार” कहा गया है। इन नदियों के किनारे ही शुरुआती बस्तियाँ बसीं और कृषि, वन-जीवन तथा सांस्कृतिक गतिविधियाँ विकसित हुईं।
नर्मदा को कई परंपराओं में उत्तर और दक्षिण के बीच की सेतु के रूप में देखा जाता है, जबकि गोदावरी और इंद्रावती दक्षिण के वन क्षेत्रों को जीवन देती हैं। महानदी पूर्व की ओर बहते हुए सांस्कृतिक आदान-प्रदान का मार्ग बनाती है। इन नदियों के किनारे स्थापित गोटुल केवल सामाजिक केंद्र नहीं थे, बल्कि ज्ञान और परंपरा के विद्यालय भी थे।
गोटुल और प्रारंभिक बस्तियाँ –
गण्डोदीप की भौगोलिक संरचना ने सामुदायिक जीवन की शैली को आकार दिया। पहाड़ों और जंगलों के बीच बसे गाँव आत्मनिर्भर होते थे। गोटुल संस्था के माध्यम से युवाओं को प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की शिक्षा दी जाती थी। लोकगीतों में यह वर्णन मिलता है कि पहली बस्तियाँ हमेशा नदी किनारे या पर्वत की तलहटी में बसाई जाती थीं, ताकि जल, जंगल और जमीन का संतुलन बना रहे।
गण्डोदीप का भौगोलिक विस्तार हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक फैली उस सांस्कृतिक स्मृति का प्रतीक है जिसमें प्रकृति और मानव एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं। विंध्याचल, सतपुड़ा और दंडकारण्य इसका केंद्र थे, जबकि नदियाँ इसकी जीवनधारा थीं। “ह्युंग खण्डी दीपा” की अवधारणा इस विशाल भू-भाग को एक जीवित इकाई के रूप में प्रस्तुत करती है, जहाँ हर क्षेत्र अपनी विशेषता के साथ पूरे गण्डोदीप का हिस्सा था।
इस तरह गण्डोदीप का भूगोल केवल नक्शे की रेखाओं से नहीं, बल्कि लोकगीतों, परंपराओं और सामुदायिक स्मृति से निर्मित एक जीवंत संसार के रूप में सामने आता है।
कोयामुरी दीप और सत्ता का केंद्र
कोयतुर परंपराओं और गोंडी मौखिक इतिहास में “कोयामुरी दीप” को गण्डोदीप की आत्मा माना गया है। यह केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था, आध्यात्मिक शक्ति और सामुदायिक न्याय का प्रतीकात्मक केंद्र था। इसी कोयामुरी दीप के भीतर स्थित पेनकमढ़ही (आज का पचमढ़ी क्षेत्र) को गण्डोदीप का सबसे सुरक्षित और प्रभावशाली सत्ता केंद्र माना जाता है। लोककथाओं, पाटा और पारंपरिक कथनों में इसका वर्णन एक ऐसी राजधानी के रूप में मिलता है जहाँ से पूरे भू-भाग की व्यवस्था संचालित होती थी।
‘सत्ता का पुड़ा’ की अवधारणा –
गोंडी दर्शन में “पुड़ा” शब्द केवल पहाड़ या भू-भाग के लिए नहीं, बल्कि शक्ति और संतुलन के केंद्र के रूप में भी प्रयुक्त होता है। पेनकमढ़ही को “सत्ता का पुड़ा” कहे जाने के पीछे यह मान्यता है कि यहाँ से सामाजिक नियम, न्याय व्यवस्था और सामुदायिक संतुलन की देखरेख होती थी।
मौखिक इतिहास में उल्लेख मिलता है कि यहाँ ८८ शंभूसेक नामक नेतृत्वकारी व्यक्तियों या संरक्षकों की परिषद थी, जो गण्डोदीप के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े निर्णयों में भूमिका निभाते थे। इन शंभूसेकों को केवल शासक नहीं, बल्कि प्रकृति और समाज के बीच संतुलन बनाए रखने वाले मार्गदर्शक के रूप में देखा जाता है। उनकी जिम्मेदारी न्याय करना, परंपराओं की रक्षा करना और समुदायों के बीच सामंजस्य बनाए रखना थी।
भौगोलिक स्थिति और सुरक्षा –
पेनकमढ़ही का भूगोल इसकी सबसे बड़ी शक्ति माना जाता था। चारों ओर से ऊँची पहाड़ियों, गहरी घाटियों और घने जंगलों से घिरा यह क्षेत्र प्राकृतिक किले जैसा प्रतीत होता है। गोंडी परंपरा में इसे ऐसी भूमि बताया गया है जहाँ बाहरी आक्रमण या संकट आसानी से प्रवेश नहीं कर सकते थे।
ऊँचाई पर स्थित होने के कारण यहाँ से आसपास के विशाल वन क्षेत्रों और मार्गों पर निगरानी रखना संभव था। लोकगीतों में यह भी कहा जाता है कि यहाँ पहुँचने के रास्ते सीमित और कठिन थे, जिससे यह स्थान स्वाभाविक रूप से सुरक्षित बना रहा। यही कारण है कि इसे अभेद्य राजधानी के रूप में देखा गया।
आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व
पेनकमढ़ही केवल राजनीतिक या प्रशासनिक केंद्र नहीं था। इसे पेन-परब परंपराओं और आध्यात्मिक अनुष्ठानों का भी प्रमुख स्थल माना जाता है। कई कथाओं में वर्णन मिलता है कि यहाँ देवस्थल और सामुदायिक सभाएँ आयोजित होती थीं, जहाँ विभिन्न क्षेत्रों से लोग एकत्र होकर निर्णय लेते और उत्सव मनाते थे।
गोंडी दर्शन में सत्ता का अर्थ प्रभुत्व नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है। इसलिए “सत्ता का पुड़ा” को ऐसे स्थान के रूप में समझा जाता है जहाँ नेतृत्व प्रकृति और समाज के नियमों के अनुरूप चलता था। यहाँ लिए गए निर्णय केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक भी होते थे।
न्याय व्यवस्था और शंभूसेकों की भूमिका
लोकपरंपरा में ८८ शंभूसेकों का उल्लेख एक प्रतीकात्मक संख्या के रूप में भी देखा जाता है, जो विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों के प्रतिनिधित्व को दर्शाती है। कहा जाता है कि विवादों का समाधान सामूहिक विचार-विमर्श से किया जाता था, जिसमें बुजुर्गों और परंपरागत ज्ञान रखने वालों की महत्वपूर्ण भूमिका होती थी।
इस व्यवस्था में न्याय का आधार प्रकृति के नियम, सामुदायिक सहमति और परंपरागत मूल्य थे। दंड देने की बजाय संतुलन स्थापित करने पर अधिक जोर दिया जाता था, जिससे समाज में सामंजस्य बना रहे।
कोयामुरी दीप का केंद्रीय स्थान
कोयामुरी दीप की अवधारणा में पेनकमढ़ही को केंद्र इसलिए भी माना गया क्योंकि यह भौगोलिक रूप से गण्डोदीप के मध्य क्षेत्र के निकट स्थित बताया जाता है। यहाँ से उत्तर के पर्वतीय क्षेत्रों, दक्षिण के वन क्षेत्रों और पूर्व-पश्चिम के नदी मार्गों से संपर्क संभव था। इस कारण यह प्रशासनिक और सांस्कृतिक दृष्टि से उपयुक्त केंद्र बन गया।
कोयामुरी दीप और पेनकमढ़ही का वर्णन गोंडी परंपरा में केवल ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि एक आदर्श व्यवस्था की स्मृति के रूप में सामने आता है। “सत्ता का पुड़ा” इस बात का प्रतीक है कि नेतृत्व का केंद्र प्रकृति के बीच, समुदाय के निकट और सामूहिक सहमति पर आधारित होना चाहिए।
चारों ओर से सुरक्षित पहाड़ियाँ, घने जंगल और सामुदायिक न्याय की परंपरा मिलकर पेनकमढ़ही को गण्डोदीप की अभेद्य राजधानी के रूप में स्थापित करती हैं। यह अवधारणा आज भी कोयतुर संस्कृति में उस आदर्श संतुलन की याद दिलाती है, जहाँ सत्ता, प्रकृति और समाज एक-दूसरे के पूरक माने जाते थे।
प्रकृति और भूगोल का अटूट संबंध
प्रकृति और भूगोल का अटूट संबंध
गण्डोदीप की अवधारणा में भूगोल केवल भौतिक संरचना नहीं था, बल्कि जीवित चेतना का विस्तार माना जाता था। पहाड़, नदियाँ, जंगल और मिट्टी, सबको एक आध्यात्मिक अर्थ दिया गया था। कोयतुर परंपरा के अनुसार हर क्षेत्र का अपना एक “टोटम” या प्रतीक होता था, जो उस स्थान की आत्मा और समुदाय की पहचान को दर्शाता था। यह टोटम केवल पूजा का विषय नहीं था, बल्कि जीवन के नियम, सामाजिक संबंध और प्रकृति के साथ संतुलन का संकेत भी था।
टोटम और भूगोल की सांस्कृतिक व्याख्या
गोंडी समाज में टोटम का अर्थ किसी पशु, वृक्ष, पर्वत या प्राकृतिक शक्ति से जुड़ी पहचान से है। हर कुल या क्षेत्र किसी न किसी प्राकृतिक प्रतीक से जुड़ा होता था, जिससे यह संदेश मिलता था कि मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं है। गण्डोदीप के विभिन्न हिस्सों में यह टोटमिक परंपरा भूगोल को आध्यात्मिक अर्थ देती थी।
इस दृष्टि से पहाड़ केवल पत्थर का ढेर नहीं, बल्कि पूर्वजों की स्मृति और शक्ति के केंद्र माने जाते थे। नदियाँ जीवन की धारा थीं और जंगल ज्ञान तथा रहस्य के स्थान। इस तरह भूगोल और संस्कृति एक-दूसरे में घुले हुए थे।
मैकल की पहाड़ियाँ और ‘सात देव’ की शक्ति
मैकल पर्वतमाला को कोयतुर परंपरा में विशेष महत्व प्राप्त है। लोकविश्वासों में इसे “सात देव” की शक्ति का केंद्र कहा गया है। यहाँ “सात देव” का अर्थ सात दिशाओं या सात प्राकृतिक शक्तियों से भी जोड़ा जाता है, जो धरती के संतुलन का प्रतीक मानी जाती हैं।
मैकल क्षेत्र से निकलने वाली नदियाँ और घने वन इस विचार को और गहरा बनाते हैं। लोकगीतों में यह वर्णन मिलता है कि इन पहाड़ियों को धरती का वह स्थान माना जाता था जहाँ प्रकृति की ऊर्जा सबसे अधिक जागृत रहती है। इसलिए यहाँ के पर्वतों को केवल भौगोलिक ऊँचाई नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊँचाई का प्रतीक भी माना गया।
दंडकारण्य (बस्तर): अबूझ शक्तियों का रक्षक
दंडकारण्य का विशाल वन क्षेत्र गण्डोदीप की सांस्कृतिक स्मृति में एक रहस्यमय और संरक्षक भूमि के रूप में उभरता है। “अबूझ” शब्द यहाँ उस ज्ञान और शक्ति की ओर संकेत करता है जिसे पूरी तरह समझ पाना आसान नहीं माना जाता। बस्तर के जंगलों को प्राचीन न्याय परंपरा और सामुदायिक संतुलन का रक्षक बताया गया है।
मौखिक कथाओं में दंडकारण्य को ऐसी भूमि कहा गया है जहाँ परंपरागत नियम प्रकृति के साथ जुड़े हुए थे। यहाँ न्याय का आधार लिखित कानून नहीं, बल्कि सामूहिक सहमति और पूर्वजों की परंपराएँ थीं। घने जंगल और दूरस्थ घाटियाँ इस क्षेत्र को बाहरी प्रभावों से सुरक्षित रखते थे, जिससे इसकी सांस्कृतिक विशिष्टता लंबे समय तक बनी रही।
मिट्टी, स्मृति और पूर्वजों की पदचाप
कोयतुर लोकदृष्टि में भूमि केवल भौतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवित स्मृति है। कहा जाता है कि गण्डोदीप की मिट्टी का हर कण पूर्वजों की पदचाप से जुड़ा है। शंभूसेकों की न्याय परंपरा और पहांदी पारी कुपार लिंगो जैसे सांस्कृतिक नायकों के उपदेशों को इस भूमि की आत्मा में समाहित माना जाता है।
यह विश्वास प्रतीकात्मक रूप से यह बताता है कि इतिहास केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि धरती और प्रकृति के भीतर भी जीवित रहता है। जब समुदाय किसी पर्वत, नदी या जंगल का सम्मान करता है, तो वह दरअसल अपने पूर्वजों और उनकी सीख का सम्मान कर रहा होता है।
प्रकृति और समाज का संतुलन
गण्डोदीप की इस कल्पना में प्रकृति और समाज अलग-अलग नहीं हैं। मैकल की पहाड़ियाँ शक्ति का प्रतीक हैं, दंडकारण्य संरक्षण का, और नदियाँ जीवन का प्रवाह दर्शाती हैं। हर टोटम मनुष्य को यह याद दिलाता है कि वह प्रकृति का हिस्सा है, उसका स्वामी नहीं।
इस तरह गण्डोदीप का भूगोल एक जीवित मानचित्र बन जाता है, जिसमें पहाड़ देवस्थल हैं, जंगल ज्ञान के भंडार हैं और मिट्टी पूर्वजों की स्मृति। यह दृष्टि बताती है कि कोयतुर सभ्यता में भूगोल केवल स्थान नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का आधार था।
