gandodeep - Bastariya Babu

गण्डोदीप: कोयतुर सभ्यता, दर्शन और आदिम चेतना का महावृत्तांत ।

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सेवा जोहार! जय सेवा! जय जोहार! जय गण्डोदीप!

 

काल के कपाल पर अंकित एक विस्मृत नाम सृष्टि के विकासक्रम में जब मनुष्य ने समूह में रहना सीखा, तब उसने अपनी पहचान के लिए कुछ आधार चुने। इतिहास की मुख्यधारा ने हमें मेसोपोटामिया, नील नदी की घाटी और सिंधु सभ्यता के किस्से सुनाए, लेकिन भारत के हृदय स्थल में रची-बसी उस आदिम सभ्यता को ‘अरण्यक’ कहकर सीमित कर दिया गया। जिसे आज दुनिया ‘गोंडवाना लैंड’ के भूवैज्ञानिक नाम से जानती है, वह हमारे पुरखों के लिए केवल मिट्टी का ढेर नहीं, बल्कि एक जीवंत सत्ता थी— ‘गण्डोदीप’

 

 

गण्डोदीप का अर्थ केवल एक द्वीप या भू-भाग नहीं है। गोंडी भाषा के मूल शब्द ‘गण्ड’ (समूह/शक्ति) और ‘दीप’ (स्थान/प्रकाश) के मेल से बना यह शब्द उस प्रकाशपुंज का प्रतीक है, जिसने आदिम मनुष्य को ‘गण्डजीव’ (एक अनुशासित सामाजिक प्राणी) के रूप में रूपांतरित किया। 

 

 

यह लेख श्रृंखला उस महान यात्रा की शुरुआत है, जो हमें हमारे गौरवशाली अतीत से मिलाएगी और भविष्य के लिए एक नई दृष्टि प्रदान करेगी। गण्डोदीप की नींव किसी साम्राज्यवादी सोच पर नहीं, बल्कि ‘कोया पुनेम’ (प्राकृतिक न्याय) के सिद्धांतों पर रखी गई थी। यहाँ का दर्शन यह मानता है कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक अत्यंत छोटा और विनम्र हिस्सा है।

 

प्राचीन कोयतुर मान्यताओं के अनुसार, इस धरती की रचना पंच-तत्वों के उस संतुलन से हुई जिसे ‘ह्युंग खण्डी दीपा’ (पांच खंडों वाली धरती) कहा गया। यहाँ का हर पर्वत, हर नदी और हर वन एक ‘पेन’ (शक्ति) का निवास स्थान माना गया। गण्डोदीप के निवासियों के लिए विकास का अर्थ जंगलों को काटना नहीं, बल्कि जंगलों के साथ लयबद्ध होकर जीवन जीना था। यही वह दार्शनिक गहराई थी जिसने इस सभ्यता को हज़ारों वर्षों तक बिना किसी विनाशकारी युद्ध के जीवित रखा। 

 

 

गण्डोदीप नाम से मैंने कुल 12 भाग लेख/आर्टिकल तैयार किया है जो की एक – एक करके इस वेबसाइट में प्रकाशित होगी

 

  • विषय: नई पीढ़ी के लिए संदेश। डिजिटल माध्यम (जैसे bastariyababu.in) से इतिहास को सहेजने की आवश्यकता और भविष्य की राह।

 

 

इस श्रृंखला का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ ‘शंभूसेक’ की अवधारणा है। वर्तमान समाज ने ‘शंभू’ या ‘शिव’ को केवल एक पौराणिक देवता के रूप में सीमित कर दिया है, लेकिन गण्डोदीप के इतिहास में ‘शंभूसेक’ एक राजनैतिक और प्रशासनिक पद था। ८८ शंभूसेकों की परंपरा यह सिद्ध करती है कि कोयतुरों के पास एक अत्यंत विकसित लोकतांत्रिक शासन प्रणाली थी।

 

      • कोसोडुम (प्रथम शंभू): उन्होंने अपनी बुद्धि और साधना से ‘मूंदमून्दशूल’ का मार्ग प्रशस्त किया। यह त्रिशूल आज के हथियारों जैसा नहीं था, बल्कि यह विचार की तीन धाराओं— सत्य, न्याय और करुणा का संगम था।

     

      • सत्ता का पुड़ा (पचमढ़ी): सतपुड़ा की चोटियों पर स्थित पचमढ़ी वह केंद्र था जहाँ से ‘सत्ता’ को एक सेवा के रूप में ‘पुड़ा’ (टोकरी) की तरह समाज में वितरित किया जाता था।

    शंभूसेक व्यवस्था यह सिखाती है कि नेतृत्व का अर्थ अहंकार नहीं, बल्कि ‘विष प्राशन’ (समाज के कष्टों को स्वयं झेलना) है। शंभू हजोर नरका का त्यौहार इसी त्याग की ऐतिहासिक स्मृति है।
     
    गण्डोदीप की सफलता का रहस्य उसकी सामाजिक बनावट में छिपा था। पहांदी पारी कुपार लिंगो ने जब इस समाज को ‘सगावेन’ (गोत्र व्यवस्था) में बांधा, तो उन्होंने केवल शादियाँ तय करने का नियम नहीं बनाया, बल्कि उन्होंने एक ‘यूनिवर्सल ब्रदरहुड’ (विश्व बंधुत्व) की नींव रखी। ७ देव, ६ देव, ५ देव और ४ देव की यह व्यवस्था प्रकृति के चक्र पर आधारित थी। इसने समाज को आंतरिक संघर्षों से बचाया और एक ऐसी व्यवस्था दी जहाँ कोई ऊँचा या नीचा नहीं था। हर व्यक्ति अपने ‘टोटम’ (प्रतीक चिन्ह) के माध्यम से प्रकृति के एक विशेष अंग की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध था। यदि किसी का गोत्र बाघ (बाघ पेन) है, तो उस पूरे समूह की जिम्मेदारी उस वन्यजीव की रक्षा करना थी। इस प्रकार, सामाजिक व्यवस्था ही ‘पर्यावरण संरक्षण’ का आधार बन गई।

    प्राचीन गोंडी गीतों और ‘पाटा’ (कहानियों) के अनुसार, गण्डोदीप की सीमाएं अत्यंत विशाल थीं। इसे ‘कोयामुरी दीप’ भी कहा गया। यह वह काल था जब सरस्वती और नर्मदा जैसी नदियाँ अपनी पूर्ण भव्यता में थीं। 

     

    आज के मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा का एक बड़ा हिस्सा इस गण्डोदीप का हृदय स्थल था। यहाँ की गुफाओं में बने शैलचित्र और पहाड़ों के नाम आज भी चीख-चीखकर उस इतिहास की गवाही देते हैं जिसे मिटाने की कोशिश की गई। पचमढ़ी से लेकर बस्तर के अबुझमाड़ तक, हर पत्थर पर शंभूसेकों और लिंगो के पदचिन्ह अंकित हैं।

     

    इस लेख में हमें उस दुःखद अध्याय को भी छूना होगा जब गण्डोदीप की शांति भंग हुई। बाहरी संस्कृतियों के आगमन और ‘आर्य’ टोलियों के साथ हुए सांस्कृतिक संघर्ष ने कोयतुरों को उनकी अपनी ज़मीन से विस्थापित करना शुरू किया।शंभू-पार्वती (अंतिम शंभू) के समय से जो ‘नानागति’ (बिखराव) शुरू हुई, उसने धीरे-धीरे हमारी भाषा ‘गोंडी माटा’ को कमज़ोर किया और हमारे ‘गोटुल’ (शिक्षा केंद्र) उजाड़ दिए गए। जो समाज कभी पूरे गण्डोदीप का स्वामी था, उसे धीरे-धीरे ‘वनवासी’ या ‘असंस्कृत’ कहकर जंगलों के कोनों में धकेल दिया गया। यह श्रृंखला उस ऐतिहासिक अन्याय की परतों को भी खोलेगी।

     

    मेरे लिए (महेंद्र कश्यप/बस्तरिया बाबू ), बस्तर केवल एक जिला नहीं है, बल्कि यह गण्डोदीप की वह ‘पवित्र तिजोरी’ है जहाँ आज भी प्राचीन परंपराएं अपने शुद्धतम रूप में जीवित हैं। बस्तर के दशहरा से लेकर यहाँ के ‘पेन जतरा’ तक, सब कुछ उसी आदिम लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है जो शंभूसेकों ने शुरू की थी।

     

    बस्तर के विद्रोह (भूमकाल) और गुंडाधुर जैसे नायकों का संघर्ष वास्तव में अपनी ‘माटी’ (मिट्टी) और ‘मया’ (प्रेम) को बचाने का संघर्ष था। इस श्रृंखला में बस्तर का एक विशेष और गहरा अध्याय होगा, जो देश-दुनिया को हमारी असली ताकत से परिचित कराएगा।

     

    आज २१वीं सदी में, जब हम जलवायु परिवर्तन और सामाजिक असमानता से जूझ रहे हैं, गण्डोदीप का दर्शन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। मेरे इस वेबसाइट (bastariyababu.in) पर इस श्रृंखला को शुरू करने का मेरा उद्देश्य केवल यादों को ताज़ा करना नहीं है, बल्कि एक वैचारिक क्रांति का बीज बोना है। 

     

    हमें अपनी लिपि (गोंडी), अपनी बोली और अपने ‘पुनेम’ को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ना होगा। यह लेख एक प्रतिज्ञा है कि हम अपने पुरखों के गौरव को केवल किताबों तक सीमित नहीं रहने देंगे, बल्कि उसे नई पीढ़ी के मोबाइल स्क्रीन और उनके दिलों तक पहुँचाएंगे।

    “गण्डोदीप” श्रृंखला एक खोज है— स्वयं की, अपनी जड़ों की और उस सत्य की जो धूल के नीचे दबा दिया गया है। यह १२ भागों की यात्रा हमें बताएगी कि हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं और हमें कहाँ जाना है।

    यह लेख उन सभी को समर्पित है जो अपनी पहचान के लिए लड़ रहे हैं, जो अपनी बोली से प्यार करते हैं और जो मानते हैं कि ‘गोंडवाना’ केवल एक सपना नहीं, बल्कि एक हकीकत है जिसे हमें फिर से जीना है।


    सेवा जोहार! जय सेवा! जय जोहार! जय गण्डोदीप!

     

     

     

     

    गण्डोदीप नाम से मैंने कुल 12 भाग लेख/आर्टिकल तैयार किया है जो की एक – एक करके इस वेबसाइट में प्रकाशित होगी। 

     

     

    पढ़ने के लिये निचे दिये लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं.

     

     

     

    भाग 1: गण्डोदीप का परिचय और भौगोलिक विस्तार।

    भाग 2: सृष्टि की उत्पत्ति और ‘शंभू’ तत्व।
     
    भाग 3: सत्ता का पुड़ा: ८८ शंभूसेकों का शासनकाल
     
    भाग 4: पहांदी पारी कुपार लिंगो और सगावेन व्यवस्था
     
    भाग 5: शंभू हजोर नरका: विष प्राशन और जागरण का इतिहास
     
    भाग 6: कोयतुर जीवन दर्शन: जल, जंगल और ज़मीन
     
    भाग 7: गोंडी माटा (बोली) और लिपि का रहस्य
     
    भाग 8: बाहरी संस्कृतियों का आगमन और कोयामुरी दीप का संघर्ष
     
    भाग 9: महान कोयतुर योद्धा और रानी दुर्गावती से लेकर गुंडाधुर तक
     
    भाग 10: बस्तर की अघोषित विरासत और आदिवासी विद्रोह
     
    भाग 11: वर्तमान चुनौतियां और सांस्कृतिक ह्रास
     
    भाग 12: पुनर्जागरण: कोयतुर पुनेम की ओर वापसी
     

     

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