मेसा बिल (ड्राफ्ट) क्या है? आदिवासी क्षेत्रों की नगर व्यवस्था पर प्रस्तावित कानून को समझें

मेसा बिल - Bastariya Babu

मेसा बिल/एक्ट (ड्राफ्ट) क्या है?

मेसा यानी Municipalities Extension to Scheduled Areas (MESA) एक प्रस्तावित विधेयक था, जिसे विशेष रूप से अनुसूचित क्षेत्रों में नगरपालिकाओं से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों को लागू करने के उद्देश्य से तैयार किया गया था। संविधान के 74वें संशोधन के बाद Part IX-A को जोड़ा गया था, जिससे पूरे देश में नगरपालिकाओं की संरचना और उनके अधिकारों को मजबूत किया जा सके। हालांकि, यह संशोधन सीधे तौर पर अनुसूचित क्षेत्रों पर लागू नहीं होता था, क्योंकि इन क्षेत्रों में पारंपरिक जनजातीय संस्थाओं और स्थानीय स्वशासन की अलग व्यवस्था मौजूद थी। इसी अंतर को पाटने और अनुसूचित क्षेत्रों में भी समान रूप से नगरपालिकाओं की व्यवस्था लागू करने के लिए यह ड्राफ्ट बिल पेश किया गया।

 

सरल शब्दों में कहें तो यह बिल आदिवासी बहुल शहरी क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन की संरचना को स्थापित करने का प्रयास था। इसका उद्देश्य केवल प्रशासनिक व्यवस्था लाना नहीं था, बल्कि आदिवासी समुदाय के अधिकारों, उनकी सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक जीवन शैली की सुरक्षा को सुनिश्चित करना भी था। बिल में यह प्रस्ताव रखा गया कि नगरपालिकाओं के गठन और संचालन में आदिवासी समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित की जाए और उनके लिए विशेष आरक्षण और सुरक्षा प्रावधान लागू किए जाएं।

इस बिल को क्यों बनाया गया था?

सरकार ने यह बिल इसलिए प्रस्तावित किया क्योंकि कई अनुसूचित क्षेत्र समय के साथ शहरीकरण की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन वहां की प्रशासनिक और स्थानीय शासन व्यवस्था पारंपरिक पंचायतों और सामान्य नगरपालिकाओं के बीच जटिल और असंगत थी। इन क्षेत्रों में विकास योजनाओं को लागू करना, बुनियादी सुविधाओं जैसे सड़क, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा का विस्तार करना, और स्थानीय निर्णय प्रक्रिया को प्रभावी बनाना चुनौतीपूर्ण हो गया था।

इसके अलावा, सामान्य नगरपालिका कानून सीधे तौर पर आदिवासी समुदाय की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप नहीं था। आदिवासी क्षेत्रों में भूमि, संसाधन और पारंपरिक जीवनशैली की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधानों की आवश्यकता थी। इसलिए यह बिल लाया गया ताकि अनुसूचित क्षेत्रों में नगरपालिकाओं की व्यवस्था लागू की जा सके, जबकि आदिवासी अधिकारों और उनकी सांस्कृतिक पहचान की रक्षा भी सुनिश्चित हो सके।

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