भारतीय उच्च शिक्षा के गलियारों में इन दिनों एक अजीब बेचैनी है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी UGC Guidelines 2026 ने अकादमिक जगत को दो धड़ों में बांट दिया है। सोशल मीडिया के विमर्श से लेकर फैकल्टी रूम की फुसफुसाहटों तक, विरोध के स्वर मुखर हैं। लेकिन इस शोरगुल के बीच, एक बुनियादी और बेहद तार्किक सवाल खडा है— “यदि सवर्ण वर्ग वास्तव में जाति आधारित भेदभाव नहीं करता, तो फिर इन गाइडलाइन्स का डर क्यों?”
यह प्रश्न किसी समुदाय विशेष को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि उस ‘इनकार’ (Denial) की संस्कृति को समझने के लिए है, जो दशकों से हमारे परिसरों में जड़ें जमाए बैठी है।
पारदर्शिता से परहेज क्यों? –
UGC की नई गाइडलाइन्स का उद्देश्य किसी को दंडित करना नहीं, बल्कि जवाबदेही (Accountability) तय करना है। इनका मकसद स्पष्ट है— कैंपस में जातिगत भेदभाव की पहचान करना, शिकायत की पारदर्शी प्रक्रिया बनाना और निवारण सुनिश्चित करना। यह कोई ‘काला कानून’ नहीं है, बल्कि एक सुरक्षा चक्र है।
तर्क सीधा है: जो कानून का पालन कर रहा है, उसे पुलिस से डरने की जरूरत नहीं होती। ठीक वैसे ही, जो शिक्षक या प्रशासक अपने छात्रों को केवल ‘छात्र’ मानते हैं, उन्हें इन नियमों से कोई खतरा नहीं है। तो फिर यह घबराहट क्यों?
सच्चाई यह है कि यह विरोध नियमों का नहीं, बल्कि ‘निगरानी’ (Surveillance) का है। अब तक विश्वविद्यालयों में सत्ता के समीकरण अदृश्य रहे हैं। किस छात्र को कौन सा रिसर्च गाइड मिलेगा, किसे फेलोशिप के लिए नामांकित किया जाएगा, और किसे ‘ब्रिलियंट’ का तमगा मिलेगा—ये फैसले अक्सर मेरिट से ज्यादा उन ‘अनकहे पूर्वाग्रहों’ (Unspoken Prejudices) से तय होते रहे हैं, जो जातिगत नेटवर्क पर चलते हैं। UGC Guidelines 2026 ने इसी अंधेरे कोने पर रोशनी डाल दी है। और इतिहास गवाह है, विशेषाधिकार को रोशनी कभी रास नहीं आती।
‘नॉर्मल’ बनाम ‘भेदभाव’ –
दशकों से हमारे परिसरों में कुछ वाक्यों को ‘नॉर्मल’ मान लिया गया था:
“तुम तो कोटे से आए हो, तुम्हें क्या चिंता?”
“तुम्हारा एकेडमिक बैकग्राउंड रिसर्च के लायक नहीं है।”
“तुम्हारे उच्चारण/भाषा में वो बात नहीं है।”
इन वाक्यों को बोलने वाले अक्सर तर्क देते हैं कि वे जातिवादी नहीं हैं, वे तो केवल ‘गुणवत्ता’ की बात कर रहे हैं। लेकिन नई गाइडलाइन्स इसे “रोजमर्रा का जातिवाद” (Everyday Casteism) मानती हैं—वह जहर जो सूक्ष्म है, लेकिन छात्र के आत्मविश्वास को भीतर से खोखला कर देता है। विरोध का असली कारण यह है कि जो व्यवहार कल तक ‘सामान्य’ था, आज उसे ‘अपराध’ या ‘दुर्व्यवहार’ की श्रेणी में रखा जा रहा है।
लिखित रिकॉर्ड का भय –
असली डर ‘पकड़े जाने’ का नहीं, बल्कि ‘रिकॉर्ड’ बनने का है। पहले शिकायतें मौखिक होती थीं, जिन्हें बंद कमरों में डांटकर या समझाकर दबा दिया जाता था। फाइलें कभी खुलती ही नहीं थीं। लेकिन नई गाइडलाइन्स ने लिखित जवाबदेही को अनिवार्य कर दिया है।
अब कमेटियां बनेंगी, सवाल पूछे जाएंगे, और हर जवाब का लिखित दस्तावेज होगा। जब सबूत मौजूद होंगे, तो मनमानी करना मुश्किल होगा। यही वह बिंदु है जहां ‘मेरिट’ की आड़ में छिपा जातिवाद असहज महसूस कर रहा है।
मेरिट का सामाजिक संदर्भ –
यह दिशानिर्देश एक और कड़वा सवाल पूछते हैं—क्या मेरिट सामाजिक संदर्भ से अलग हो सकती है? जब संसाधन, पारिवारिक शिक्षा और सामाजिक पूंजी समान नहीं है, तो केवल अंग्रेजी बोलने के लहजे या रटे-रटाए अंकों को ही ‘मेरिट’ मान लेना कितना न्यायसंगत है? यह सवाल उस वर्ग को सबसे ज्यादा चुभता है, जिसने मेरिट को अपनी नैसर्गिक संपत्ति मान रखा है।
अंतिम सत्य यही है कि जो शिक्षक निष्पक्ष हैं, जो प्रशासन ईमानदार है, और जो छात्र को उसकी जाति से पहले एक इंसान और विद्यार्थी मानता है—उसे UGC Guidelines 2026 से रत्ती भर भी भय नहीं है। वे इसका स्वागत करेंगे क्योंकि इससे उनका काम और आसान होगा।
डर केवल उन्हें है, जिनकी ताकत सवाल न पूछे जाने पर टिकी थी। यदि जाति नहीं है, तो डर कैसा? और यदि डर है, तो इसका मतलब साफ है कि कहीं न कहीं, कुछ न कुछ गलत जरूर हो रहा था।

