आदिवासी आज भी न्याय से दूर क्यों?
भारत खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है। संविधान ने समान अधिकार दिए हैं, न्याय की गारंटी दी है, और हर नागरिक को अपनी बात रखने की स्वतंत्रता दी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह स्वतंत्रता हर समुदाय को बराबर मिली? कागजों में अधिकार भले ही समान हों, लेकिन ज़मीन पर सच्चाई एकदम अलग है। और यह सच्चाई सबसे ज्यादा दिखाई देती है उन जगहों पर, जहाँ सबसे पुरानी सभ्यताएँ बसी हैं – हमारे आदिवासी समुदायों में।
यह वही समुदाय है जिसने इस देश की धरती को बचाए रखा, जंगलों को संभाला, नदियों को जीवित रखा और पहाड़ों की आत्मा को संरक्षित किया। यह वही लोग हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि “धरती माँ के सबसे करीबी बच्चे हैं।” लेकिन आजादी के बाद से आज तक इन्हें जिस अन्याय, शोषण और दुर्भावना का सामना करना पड़ा है, वह लोकतंत्र के चरित्र पर सबसे बड़ा सवाल है।
मीडिया, सरकार और व्यवस्था – इन तीनों की चुप्पी ने आदिवासियों की आवाज़ को लगभग दबा दिया है। और जो बात सबसे ज़्यादा खटकती है, वह यह कि उनकी हर मांग, हर सवाल और हर संघर्ष को एक ही शब्द से कुचल देने की आदत बन चुकी है – “नक्सली।”
– तो क्या आदिवासी अधिकार मांगेगा तो नक्सली कहलाएगा?
– क्या अपनी जमीन की रक्षा करना देशद्रोह है?
– क्या जल–जंगल–ज़मीन की बात करना अपराध है?
– क्या सरकारें किसी समुदाय को सिर्फ इसलिए खामोश कर देंगी क्योंकि वह कमजोर है?
चलिए इस लेख में इन सब सवालों को विस्तार से समझने की कोशिश करते है — तथ्य, इतिहास, राजनीति और आज की स्थिति को जोड़ते हुए।
1. मीडिया की चुप्पी: क्या खबर है और क्या नहीं?
आज के दौर में मीडिया शक्तिशाली है। एक घटना को 24 घंटे में देशव्यापी मुद्दा बनाया जा सकता है, और एक सच्चाई को सालों तक दबाया जा सकता है। आदिवासियों के मामले में अधिकतर यही दूसरा विकल्प अपनाया जाता है। जब भी किसी कथित नक्सली के मारे जाने की खबर आती है, टीवी स्क्रीन लाल अक्षरों से भर जाते हैं। बहादुरी, ऑपरेशन, सफलता — यह शब्दों की बाढ़ आती है। लेकिन खबर यह कभी नहीं बनती कि:
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उस गांव में स्कूल नहीं है
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अस्पताल तक सड़क नहीं
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राशन कार्ड नवीनीकरण के लिए लोग 40–50 किलोमीटर पैदल जाते हैं
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खनन परियोजनाओं ने पूरे गांव को उजाड़ दिया
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आदिवासी युवाओं को बिना सबूत गिरफ्तार किया गया
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जंगली इलाकों में महिलाएँ आज भी सुरक्षा संकट से जूझती हैं
मीडिया सिर्फ संघर्ष दिखाती है, कारण नहीं। नतीजा?
देश के बड़े हिस्से में एक धारणा बनी हुई है कि आदिवासी क्षेत्र = नक्सल क्षेत्र।
इस गलतफहमी ने हजारों ज़िंदगियों को बर्बाद किया है।
2. विकास के नाम पर उजड़ते घर: किसका विकास?
भारत का विकास मॉडल पिछले कई दशकों से एक ही सूत्र पर चलता आया है:
जंगल खाली करो — उद्योग लगाओ — संसाधन निकालो।
यह मॉडल ज्यादातर आदिवासी क्षेत्रों पर चोट करता है।
चूंकि खनिज इन्हीं इलाकों में हैं, इसलिए सरकारें और कंपनियाँ इन्हीं गाँवों को टार्गेट करती हैं।
उदाहरण देखें:
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कोयला खदान
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लोहे की खदान
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डैम और जलविद्युत परियोजनाएँ
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स्टील प्लांट
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औद्योगिक कॉरिडोर
इनके लिए सबसे पहले होती है जमीन अधिग्रहण।
और जमीन अधिग्रहण का सबसे आसान निशाना कौन?
वही आदिवासी समुदाय जिन्हें कानूनी भाषा और सरकारी प्रक्रिया का पूरा ज्ञान नहीं होता। कई बार पेसा एक्ट, वन अधिकार कानून और ग्राम सभा की अनिवार्यता को दरकिनार कर दिया जाता है। पंचायतों की सहमति तक को झूठे दस्तावेजों से बदल दिया जाता है। और फिर वही जमीन, जिसे आदिवासियों ने पीढ़ियों तक बचाए रखा, निजी कंपनियों को सौंप दी जाती है। परंतु मीडिया इन विस्थापनों को कभी ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं बनाती। क्योंकि यह खबरें सत्ता को असहज करती हैं, कंपनियों को कटघरे में खड़ा करती हैं, और विकास मॉडल की खामियों को उजागर करती हैं।
3. सुरक्षा का संकट: सबसे कमजोर पर सबसे भारी मार
आदिवासी महिलाओं पर हिंसा देश की सबसे छिपी हुई त्रासदियों में से एक है। बलात्कार, उत्पीड़न, फर्जी केस, अवैध गिरफ्तारी — यह सब मौजूद है, लेकिन “नक्सल प्रभावित क्षेत्र” का लेबल इन आवाज़ों को दबा देता है।
अधिकतर मामलों में:
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FIR दर्ज नहीं होती
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मेडिकल रिपोर्ट में देरी होती है
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पुलिस कार्रवाई अधूरी रहती है
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पीड़िता पर दबाव डाला जाता है
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न्याय वर्षों तक टलता रहता है
यह सिर्फ कानूनी कमजोरी नहीं, बल्कि प्रशासनिक असंवेदनशीलता है। और इसका दुष्परिणाम यह होता है कि समुदाय का विश्वास शासन से पूरी तरह टूट जाता है।
4. गरीबी और विस्थापन: दोहरी मार
आदिवासी भारत के सबसे गरीब, सबसे भूखे और सबसे उपेक्षित नागरिकों में हैं। यह गरीबी उनकी संस्कृति की देन नहीं है, यह दशकों की नीतिगत विफलताओं का परिणाम है। स्कूल दूर हैं, शिक्षक नहीं हैं। आंगनबाड़ी चलती नहीं, पोषण योजना कागजों पर है। स्वास्थ्य सेवाएँ लगभग न के बराबर हैं। रोजगार के विकल्प नहीं। जंगल कटे तो आजीविका भी छिनी। इसी गरीबी को बहाना बनाकर कई बार उन्हें “आसान लक्ष्य” बना लिया जाता है — चाहे सरकार हो, चाहे उग्रवादी संगठन।
5. “नक्सली” का ठप्पा: राजनीतिक हथियार बन चुका है
यह मुद्दा सबसे गहरा और सबसे खतरनाक है। प्रशासन और मीडिया के लिए “नक्सली” शब्द बहुत सुविधाजनक है। क्यों?
क्योंकि:
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इस लेबल से सवाल पूछने वाले की आवाज़ दब जाती है।
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किसी भी पुलिस कार्रवाई को वैध ठहराना आसान हो जाता है।
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पूरे समुदाय को शक की नजर से देखा जाता है।
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गलतियों पर पर्दा डालना आसान हो जाता है।
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निर्दोष की मौत को “राष्ट्रीय सुरक्षा” का मामला कहकर खत्म कर दिया जाता है।
इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है जब:
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निहत्थे ग्रामीणों को नक्सली बताकर मार दिया गया
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अदालत ने बाद में कहा कि लोग निर्दोष थे
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लेकिन तब तक परिवार टूट चुका था
यह सिर्फ गलती नहीं, यह इंसाफ की सबसे बड़ी विफलता है।
6. हथियार कहाँ से आते हैं? जवाब कोई नहीं देता
सरकार भी नहीं, मीडिया भी नहीं, और विशेषज्ञ भी नहीं। यह सबसे बड़ा अनसुलझा सवाल है:
जो लोग दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करते हैं, उन तक हथियार कैसे पहुँच जाते हैं? स्पष्ट है कि यह नेटवर्क बाहर से आता है। आदिवासी इस संघर्ष के केंद्र में नहीं, बल्कि बीच में फंसे हुए लोग हैं। लेकिन दोष उन्हें ही दिया जाता है क्योंकि वे सबसे कमजोर हैं, और सबसे आसान निशाना भी।
7. इतिहास का उल्टा न्याय: जिन्होंने लड़ाई लड़ी, वही आज हाशिये पर
यह बड़ा विरोधाभास है। आजादी की लड़ाई में सबसे पहले आवाज़ किसने उठाई? झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, उड़ीसा, महाराष्ट्र और मध्य भारत के आदिवासी समुदायों ने। बिरसा मुंडा, टंट्या भील, कोया आंदोलन, संथाल विद्रोह — यह इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। उन्होंने अंग्रेजों को चुनौती दी, अपनी जमीन की रक्षा की, अपने हक के लिए जान दी।
लेकिन आज, आजादी के 75 साल बाद भी उनके हिस्से में आया:
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विस्थापन
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गरीबी
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अशिक्षा
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बेरोजगारी
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सुरक्षा संकट
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“नक्सली” का ठप्पा
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और न्याय के लिए अंतहीन भटकन
यह सम्मान का नहीं, बल्कि शर्म का विषय है कि जिसने देश के लिए सबसे पहले संघर्ष किया, उसी समुदाय को बाद में सबसे ज्यादा कष्ट सहने पड़े।
8. असली जिम्मेदार कौन?
सिर्फ नक्सलवाद नहीं, राजनीतिक दलों और सरकारों ने कई बार नक्सलवाद को बहाना बनाकर विकास की कमी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक असफलताओं को छिपाया है।
क्या सिर्फ नक्सलवाद जिम्मेदार है?
नहीं।
• दशकों की नीतियों ने समुदायों को हाशिये पर धकेला
• स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, रोजगार — इन सबका वादा अधूरा रहा
• जमीन अधिकार सुरक्षित नहीं किए गए
• ग्राम सभा की बात सिर्फ कागजों में रह गई
• भ्रष्टाचार ने योजनाओं को खोखला किया
जब किसी समाज के सारे रास्ते बंद कर दिए जाएँ, तब असंतोष पनपता है। यह प्राकृतिक प्रतिक्रिया है, न कि अपराध।
9. सरकारें आखिर चाहती क्या हैं?
यह सवाल जितना सरल लगता है, उतना ही पेचीदा है। कई बार यह लगता है कि सरकारें आदिवासी संस्कृति को म्यूज़ियम की तरह संरक्षित करना चाहती हैं — मेले, नृत्य, हस्तशिल्प, पर्यटन।
लेकिन असल जीवन में उसी समुदाय की जमीन, जंगल और गाँव विकास परियोजनाओं के लिए खाली करा लिए जाते हैं।
इसका मतलब क्या है?
• संस्कृति चाहिए – लेकिन लोग नहीं.
• त्योहार चाहिए – लेकिन उनके जंगल नहीं.
• हस्तशिल्प चाहिए – लेकिन उनकी जमीन नहीं.
• नृत्य चाहिए – लेकिन नर्तक नहीं.
यह दोहरापन आदिवासी अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
10. समाधान क्या है? और न्याय कब तक टलेगा?
देश तभी लोकतांत्रिक कहलाता है जब:
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हर व्यक्ति की आवाज़ बराबर सुनी जाए
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हर नागरिक के हक का सम्मान हो
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कानून किसी को डराने का साधन न बने
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मीडिया सच्चाई दिखाने से डरे नहीं
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सरकारें संवाद को ताकत समझें, खतरा नहीं
आदिवासी क्षेत्रों में स्थायी समाधान एक ही है:
संवाद + संवेदनशील प्रशासन + वास्तविक विकास + कानूनी सुरक्षा + जमीन अधिकारों की गारंटी।
बिना इन पाँचों के कोई शांति, कोई विकास, कोई भरोसा नहीं बनेगा।
एक लोकतंत्र तब तक स्वस्थ नहीं हो सकता जब तक उसका सबसे कमजोर समुदाय सुरक्षित न हो।
और आज भारत का आदिवासी समुदाय सबसे कमजोर कड़ी है।
यदि आवाज़ उठाने पर “नक्सली” कह दिया जाए,
यदि अधिकार मांगने पर डराया जाए,
यदि जमीन बचाने पर गोली चलाई जाए,
तो यह लोकतंत्र की हार है, देश की नहीं।
यह सवाल देश से, सरकारों से और हम सब से है —
आखिर यह अन्याय कब तक?
क्योंकि जिस राष्ट्र की नींव ही न्याय पर न टिके,
वह धीरे-धीरे एक विशाल यातनागृह में बदल जाता है।

